साथी

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Saturday, May 8, 2010

कंपनीबाग, इलाहाबाद

उसी उद्यान परिसर में विक्टोरिया स्मारक तथा गोल पार्क व अन्य क्रीड़ा मैदान। इसी परिसर मेँ मदन मोहन मालवीय स्टेडियम भी है।

यही बाक़ी निशाँ होगा


चन्द्रशेखर आज़ाद की प्रतिमा, शहीद हुए जहाँ वो उसी स्थान पर लगभग। मेले हर बरस लगने की उम्मीद भी कुछ ज़्यादा ही लगा ली क्या रामप्रसाद बिस्मिल ने?
सालाना माल्यार्पण तो होता है यहाँ और उस दिन आइस्क्रीम और चुरमुरे के ठेले भी आ जाते हैं एक दो, मेला..
पता नहीं और जगहों पर यह भी होता है या नहीं!
अब सेलेबुलता के आधार पर मेले प्रायोजित किए जाते हैं।
जय हो!

Thursday, April 29, 2010

तिपतिया : बड़े शहर की हसीनाएँ

तिपतिया के अन्तर्गत 'बड़े शहर की हसीनाएँ' रचना के साथ लगे फ़ोटो के बारे में एक स्पष्टीकरण देना ज़रूरी है। यह जो युवती का चित्र साथ में लगा है, यह कोई वास्तविक चित्र नहीं है।
वास्तव में एक और बात थी जिसने इस चित्र के संदर्भ को मज़बूत किया। मेरी रचना में सोच थी कि - "ये हसीं पुतलियाँ क्या फ़ैक्ट्रियों में बनती हैं?"
और ये सुन्दरी वाकई फ़ैक्ट्री में निर्मित हुई है, ऐसा ही समझिए।

यह चित्र एक मॉडल "तिका" के चित्र पर आधारित अवश्य है, पर है यह एक कलाकार की चित्रकला का अद्भुत नमूना और वास्तविक से भिन्न। इस चमत्कारी चित्र वाली युवती का केवल चित्र में ही अस्तित्त्व है। इसे चित्रकार ने लगभग 70 घण्टों के अथक परिश्रम से तैयार किया है और इसको नाम दिया है - "TICA"।
इस कृति को रचा है श्री Dru Blair ने और इसका पूर्ण विवरण यहाँ उपलब्ध है -
http://www.drublair.com/comersus/store/tica.asp

अमिया वाली ग़ज़ल : नवीनतम शे'र



अमिया वाली ग़ज़ल में हालात के मद्देनज़र एक शे'र और जुड़ गया है -
फलने पर   डण्डे   मिलते -  दस्तूर   पुराना  है,
सबकी अपनी अपनी नीयत कहाँ बदलती है!

Wednesday, April 28, 2010

तिपतिया

तिपतिया यानी तीन पंक्तियों की रचनाएँ। कोई इस तरह की रचनाओं को हाइकु कहता है, (उसका अलग शिल्प है), गुलज़ार त्रिवेणी कहते हैं, तो कोई कुछ तो कोई और कुछ …
मैं 'तिपतिया' कहता हूँ, जिसे अंग्रेज़ी में 'क्लोवर' कहते हैं। बचपन में जंगली घास की तरह उगा हुआ पाते थे, पत्ती तोड़कर खा लेते थे - खट्टे से स्वाद का, अजब सी मिठास से जुड़ा, मगर आख़िरश ज़ुबाँ पे खट्टा स्वाद ही रह जाता था। तो मेरी कुछ तिपतियाँ पेश हैं आज…
BLOG tree with birds 
* ब्लॉगरी
ब्लॉग दुनिया पुराना नीम का पेड़,
ब्लॉगिये पंछी सुबह निकले थे,
शाम को दिन गँवा के लौटे हैँ।
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sunset* दिन
सुबह पानी में जगमगा के उगा
तवील राहों पे बेवजह तपा
और फिर पानियों में कूद गया
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Poshak

* पोशाक
रेशमी ख़ाब, हक़ीक़त सूती
पसीनोँ मेँ नहाई रहती है
और बस इसलिए नहीं जलती…
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TICA smaller
* बड़े शहर की हसीनाएँ
जिस्म छूने से कुछ गुरेज़ नहीं
दिल नहीं छूतीं,चमकदार हैं सब-
ये हसीं पुतलियाँ क्या फ़ैक्ट्रियों में बनती हैं?
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* लोग
Mumbai Marine Drive crowded
पत्थरों पे सागर की ओर पैर लटकाए-
सर झुकाए बैठे सब - साँझ ढले देर हुई
मेरे फ़्लैट जैसी क्या सब की गुम हुई चाभी?
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  * बड़ा शहर
Night Mumbai
तेज़ रफ़्तारें, चमचमाती कारें, सब रौशन-
दाम कुछ चीज़ों पे, कुछ पे नहीं-बिकाऊ सभी,
ये बड़ा शहर बड़ी सी दुकान लगता है !
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Monday, April 26, 2010

सार्थक क़दम

 आज कुछ सार्थक प्रयास नज़र में आए। ज़रूरी लगा कि उन्हें साझा किया जाए और ये कोशिश की जाए कि इनकी गूँज जाए ज़रूर, बाक़ी मेरा पैग़ाम जहाँ तक पहुँचे।
Pix0595पहला प्रयास तो लगा एक डाक में मिला लिफ़ाफ़ा, दक्षिण पूर्व रेलवे से (चित्र बाएँ)।
एक आम लिफ़ाफ़ा जो सरकारी डाक में प्रयोग में लाया जाता है, वह इससे लगभग तीन गुना बड़े आकार का होता है, जबकि अधिकांश पत्र इस आकार के लिफ़ाफ़े में भेजे जा सकते हैं।
हो सकता है कि इस प्रयास को पर्याप्त प्रचार मिला हो, बहुत प्रोपेगैण्डा हुआ हो, हो सकता है प्रचार न भी मिला हो।
 Pix0594
आज मेरी नज़र से यह लिफ़ाफ़ा पहली बार गुज़रा तो मुझे इसे साझा करना ज़रूरी लगा कि शायद और भी कई लोगों को यह प्रेरित कर सके, ऐसे ही और प्रयासों के लिए।
यह अपारम्परिक आकार काग़ज़ की बचत और तदनुरूप पर्यावरण के प्रति बेहतर तो है ही, जहाँ तक हम काग़ज़ को पूरी तरह हटा नहीं पा रहे। तुलनात्मक आकार के लिए दाएँ का चित्र देखें।
दूसरा सार्थक प्रयास है राजभाषा समिति की मंत्रालय के स्तर पर हुई बैठक के सार–अंश। यह ध्यान तुरन्त गया कि समिति के सम्मनित सदस्य / सदस्या तो कह रहे हैं कि कठिन शब्दों के प्रयोग से बचा जाय, मगर हमारे हिन्दी के रंग में रंगे कर्मी निर्देश लिख-बाँट रहे हैं –“क्लिष्ट  शब्दों का प्रयोग न हो”। Pix0597
भाई मेरे, ‘क्लिष्ट’ अपने आप में ही क्लिष्ट नहीं है क्या? यहाँ ‘कठिन’ से भी काम चल सकता था, जो आसानी से समझ में आता है। नहीं तो क्लिष्ट को दुरूह कहें और अधिक बोधगम्य शब्दों का प्रयोग कह कर और भी मुश्किल बना दें। अगर ‘मुश्किल’ ही लिख दें तो क्या हर्ज़ है?
तीसरा सार्थक क़दम, जिसके बारे में कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं, चित्र सब कुछ स्वयम् ही कह रहा है, नीचे देखें-
Pix0592
चित्र थोड़ा और बड़ा होता तो और आसानी से समझ में आता, मगर मैं थोड़ी सी व्याख्या कर देता हूँ सहायता के लिए। सबसे ऊपर एक पोस्टर है, जिसका कैप्शन है - “आपके बच्चे का भविष्य आपके हाथ में है”। (यहाँ बच्चे को ही हाथ में दिखाना विज्ञापनीय टोटका ही लगता है)
बाक़ी पोस्टर के नीचे, उसके बाएँ, फिर और बाएँ देख कर समझा जा सकता है। वैसे मुझे लग रहा है कि भले ही किसी का भविष्य किसी के भी हाथ में हो, जान और वर्तमान तो शायद इस वाहन के चालक के हाथ में ही है, जो सवार हैं उनका भी, और जो आगे-पीछे-सामने चल रहे हैं उनका भी।
चौथा सार्थक क़दम मैं उठा रहा हूँ, अपनी बक-बक बन्द करके।

Friday, April 23, 2010

विदाई समारोह


श्री जे0पी0 पाण्डेय का उत्तर मध्य रेलवे अधिकारी संगठन की ओर से विदाई समारोह संपन्न हुआ। वे अपर मण्डल रेल प्रबंधक झाँसी होकर जा रहे हैँ।

भाग्य-विधाता : आज फूल नहीं लाया हूँ

आज फूल नहीं फल लाया हूँ।
गर्मी के मौसम में होने वाला ये बेल का फल प्राचीन भारतीय आयुर्वेद में वर्णित तीन अमृत-फलों में से एक है। इसकी ख़ूबियों से तो ज़्यादातर लोग वाकिफ़ होंगे, मगर ज़रा डाल पे इसकी ख़ूबसूरती तो देखिए!
आप कह सकते हैं कि डाल पे तो हर चीज़ ख़ूबसूरत लगती है!
हाँ लगती तो है, मगर ख़ुद कटी हुई डाल या गिरा हुआ पेड़?
जनाब, वो भी ख़ूबसूरत लगता है, अगर आप उसका हौसला देखें कि जिस इन्सान ने उसे काट डाला हो, उसे नज़र-अन्दाज़ करके अपनी सारी जिजीविषा से वो पेड़ किस ऊर्जा का, किस कोशिश का परिचय देता है वापस अपनी जद्दोजहद शुरू करने में - ताकि वो उसी इन्सान की नस्लों को छाँह और पंछियों को आसरा दे सके।
इसीलिए आज ये तीसरी तस्वीर भी लाया हूँ - जिसमें उखड़े पड़े पेड़ से निकलती झूमती टहनियों को जैसे गर्मी की तकलीफ़ों से अगर सरोकार है तो सिर्फ़ इतना कि वो उस गर्मी में छाँह देने के अपने फ़र्ज़ को और शिद्दत से महसूस कर रही हैं और डाल, या धीरे-धीरे फिर से पूरा पेड़ बनने की कोशिश में लगी हैं।
ये नज़र-नज़र की बात है कि आप क्या देखते हैं, दर्द या राहत, ग़म या ख़ुशी, हार या हौसला!
जैसा हम देखते हैं, वैसा ही सोचते हैं; जैसा सोचते हैं, वैसा ही चुनते हैं और जैसा चुनते हैं, वैसा ही पाते भी हैं।
आप ही हैं अपने भाग्य-विधाता।
जब चु्नना अपने हाथ में है तो क्यों न बेहतर चुनाव किए जाएँ और उदासी न बाँटकर, उम्मीद बाँटी जाए!
http://www.google.com/profiles/HIMANSHU27
http://sangam-teere.blogspot.com/

Thursday, April 22, 2010

सभा

सभा चल रही है। धर्म, जाति, भाषा, क्षेत्र, रंगभेद जैसे मुद्दोँ पर विचार नहीँ होगा।
दहेज, आतंकवाद, कन्या-भ्रूण हत्या, घोटाले, आईपीएल, सानिया-शोएब, नोट-वोट-माला और आरक्षण आदि पर आदमीपन नहीँ दिखाया जाएगा। दुम का प्रयोग सामाजिक स्तर पर नहीँ, निजी तात्कालिक ज़रूरतोँ को स्वतः निपटाने हेतु किया जा सकता है।
बुनियादी मुद्दोँ जैसे भूख, आवास आदि पर प्रयास जारी रहेँगे, चर्चाएँ व सभाएँ नहीँ की जाएँगी।
मतभेद की दशा मेँ निपटारा कोने मेँ नहीँ, खुले मैदान मेँ होगा-और बीच मेँ कोई नहीँ आएगा। अभी सामूहिक स्वल्पाहार पर संगठन को मज़बूत करने के लिए कार्यकर्ता जुटे रहेँगे।

Wednesday, April 21, 2010

और अब ये फूल

और अब ये फूल ऋतुसंहार को आए
सूर्य को सूरज - मुखी बन कर बहुत भाए

Tuesday, April 20, 2010

खेती और बागवानी : अवैज्ञानिक तरीके और पर्यावरण को नुक्सान

पर्यावरण को नुक्सान पहुँचाने में एक दूसरे की होड़ में हैं सब।
इन चित्रों में देखिए - एक निहायत अवैज्ञानिक तरीक़ा जो अपनाया जाता है पतझड़ के बाद पत्तियों के निस्तारण का -  उन्हें जला डालते हैं। दो चित्रों में झुलसे हुए पेड़ दिख रहे हैं और तीसरे में किस तरह झड़ी हुई पत्तियाँ - जहाँ जैसे थीं, जला दी गई हैं और राख दिख रही है।
दु:खद बात यह है कि यह राजकीय उद्यान में - जहाँ उन्नत तकनीक की कृषि, बागवानी और पौधशाला का विकास आदि करने के लिए एक पूरा सरकारी अमला नियोजित है, वहाँ भी हो रहा है। नासमझी में इसका अनुकरण भी बहुत से लोग कर सकते हैं।
नतीजतन जो पर्यावरण का नुक्सान - धुआँ - प्राकृतिक जैव खाद जो बन सकती थी, उसका नुक्सान - जैव माइक्रोबियल उत्पादों का राख में तब्दील हो जाना - ये सब तो होता ही है; ऊपर से इस सुलगती आग से कई बार अग्निकाण्ड भी हो जाते हैं।
मेरी मुख्य चिन्ता इन सुलगती पत्तियों से झुलसने वाले पेड़ों को लेकर है। पेड़ कई बार तो तना/जड़ें झुलस जाने के कारण मर जाते हैं, कई बार अगले मौसम तक फूल-फल नहीं पाते और कई बार इन पेड़ों पर बसेरा करने वाले पक्षी, मधुमक्खी के छ्त्ते और अन्य कीट-पतंगे आदि भी या तो नष्ट हो जाते हैं या भौगोलिक तौर पर अपना स्थान बदल लेते हैं और इस तरह प्रकृति से अनावश्यक छेड़-छाड़ से प्रकृति की "डाइवर्सिटी" बदल जाती है।
पतझड़ के ठीक बाद गर्मी आ चुकी होती है और पानी का संकट प्रारम्भ हो जाता है, जिससे इस स्थिति में सुधार और भी दुष्कर हो जाता है।
पेड़ों को सीधे होने वाला नुक्सान टाला जा सकता है, सिर्फ़ थोड़ी सी जागरूकता और मालियों व किसानों की शिक्षा से
कि इस तरह जला कर पत्तियों से केवल मच्छर भगाए जाते हैं जो एक या दो दिन में फिर वापस आ जाते हैं, जबकि नुक्सान अनेक हैं।
नई कृषि तकनीकों में एक मशीन भी शामिल है जो गेहूँ, धान आदि की बालियाँ काट लेती है, जिससे अन्न की बर्बादी तो बहुत कम होती है, मगर शेष पौधा खेत में खड़ा ही रहता है। इसके बाद इस डंठल या तने को सीधे आग लगा कर जला दिया जाता है और खेत में बाद में रासायनिक उर्वरकों का प्रयोग कर उर्वराशक्ति बढ़ा ली जाती है।
इस प्रक्रिया में खेत की नैसर्गिक उर्वरा शक्ति का ह्रास तो लम्बी अवधि में होता है, मगर भूसे का नुक्सान तुरन्त ही हो जाता है।
परिणाम यह होता है कि जब तक यह प्रक्रिया केवल कुछ बड़े काश्तकारों तक सीमित है, तब तक शायद असर न पता चले, मगर बड़े स्तर पर यह पशुओं के चारे की समस्या को भी विकरालता प्रदान कर सकती है।
पता नहीं कहीं मेरी चिन्ता अतिवादिता या निराशावादिता का रूप तो नहीं ले रही!

गुलमोहर

गुलमोहर की ये तस्वीरें मैंने आज चन्द्रशेखर आज़ाद उद्यान उर्फ़ कम्पनी बाग़ में लीं (सुबह 6:45) और इनसे ये साबित हो रहा है कि गुलमोहर के फीकेपन के लिये गर्मी सीधे ज़िम्मेदार नहीं है। पानी पाने वाले पेड़ के फूलों में फीकापन नहीं आया, जबकि पानी की कमी वाले पेड़ के फूल फीके हैं यक़ीनन।
मगर पानी की कमी के लिए तो गर्मी ही ज़िम्मेदार है न!
तो ज्ञानदत्त जी की बात …इति सिद्धम्

मट्ठा मौसम


ये है वो मट्ठे का गिलास जो हमेँ आज ऑफ़र किया गया, सत्तू क्लब की वार्षिक सदस्यता के साथ।
उत्तर मध्य रेलवे के मानचित्र पर यह रखा भी वहीँ है जहाँ से आया है यानी खागा और भरवारी के बीच।
चियर्स!

Monday, April 19, 2010

अनुरञ्जिनी : 9

ये रहीं फूलों की होली की तस्वीरें, मयूर नृत्य की कल लगाऊँगा।
तस्वीरों की गुणवत्ता कम है, मोबाइल से दूर से ली गई हैं।
अद्भुत अनुभव होता है इस मथुरा की फूलों की होली को देखना। अलौकिक। यह मैंने दूसरी बार देखा और महसूस किया। पहली बार 2006 में देखा था। कोशिश करूँगा कुछ समय बाद कि अगर वीडियो उपलब्ध हुआ तो यहाँ ला गेरूँ। इसे बाँटना भी सुखद होता है और पाना भी।
उत्सव और महिला कल्याण संगठन की रिपोर्टिंग भी करनी है अभी तो! वैसे रिपोर्टिंग तो यह भी है ही।


बूझो तो जानें


भाई हमारा इरादा पहेली बुझवाने का या कुछ आलतू-फालतू नहीं है। हम तो सिर्फ़ ये भूल गए हैं कि ये फ़ोटो हमने कहाँ खींचा है। सिर्फ़ ये याद है कि इस बिल्डिंग के सारे तलों पर बहार का अनुग्रह देखकर हमने चलती गाड़ी से हाथ निकाल कर मोबाइल कैमरा ऊपर को कर के फ़ोटो खींच लिया।
भूल गए वर्ना पहले ही कहीं चेंप देते या बज़ा देते।
आज मोबाइल का मेमोरी कार्ड निकाल कर फ़ॉर्मैट करना पड़ा तो फ़ोटो मिल गया। जिसका हो ले जाए, बस बता दे कि कहाँ का है।
हम फालतू की उलझन से तो छूटें।
ससुरी गर्मी इतनी पड़ रही है कि लग रहा है खुपड़िया पे हीट सिंक लगवा लें। प्रवीण पाण्डेय जी ने पुराने कम्प्यूटर की बात की है, हमारा भी लगता है सीपीयू - रैम बदलवा तो सकते नहीं, अपग्रेड करा लें का।
तभी भूल गए लगता है।

अनुरंजिनीः8

उमरेमकसं की सांस्कृतिक संध्या मेँ मथुरा की "फूलोँ की होली" : ब्रज कलाकारोँ द्वारा मयूर नृत्य प्रस्तुति