हाल में महानता के मानक चर्चित रहे। अब अगली कड़ी में जैसे ही ब्लागरी में महानता के मानक तय करने की बात आई, लोग मूल प्रश्न से भटके हुए लगते हैं। यहाँ तक कि प्रश्न स्वयम् भी।
ज्ञानदत्त जी की मानसिक हलचल में प्रश्न उठा कि कौन बड़ा ब्लॉगर, और शुरू हो गए पत्थर चलने, सिर-फुटव्वल।
मैं अभी तक यही सोच रहा था कि “बड़ा” तय करने के आधार कोई बताएगा, तब खेल शुरू होगा। बिना नियम बताए तो कोई मैच नहीं हो्ता, न कोई शास्त्रार्थ्। और अपनी पसंद के आधार पर ही अगर तय करना हो तो फिर तो यह निजी मामला हो गया। यदि मतदान करना हो, तो चुनाव घोषणापत्र चाहिए, और फिर उस पर उम्मीदवारों की चर्चा।
अक्सर तो यही होता है, पर यहाँ कोई समिति भी नहीं बनी है जो सर्व-सम्मति से ऐसे नियम तय कर दे। कमाल यह है कि इण्टरनेट चल रहा है, खुले में, मगर हिन्दी-ब्लॉग-जगत में मूल्यांकन क्या केवल व्यक्तिगत सुविधा के आधार पर होगा?
मेरे अपने सुझाव हैं, जिनके तहत मुझे लगता है कि ब्लॉग या ब्लॉगर का क़द नापने की कोशिश में जो बातें महत्वपूर्ण रहेंगी, उनमें से कुछ बिन्दु हैं -
2) ब्लॉग पर कुल टिप्पणियाँ
3) ब्लॉग की उपयोगिता
4) ब्लॉगर की सामाजिकता और व्यावहारिकता (वैसे यह न भी हो तो भी लोग अंत में अपने पसंदीदा ब्लॉगर को ऊँची रैंकिंग देंगे ही)
5) ब्लॉग की कुल संख्या और वर्गीकरण – जैसे कोई कविता, कहानी, चर्चा, लेख और तकनीकी सहायता आदि में से किस-किस कोटि में सक्रिय है। अब एक दर्शन-फ़लसफ़े पर बने ब्लॉग की तुलना चुटकुलों के ब्लॉग से करना तो असंगत ही होगा न?
6) ब्लॉग-सामग्री की गुणवत्ता – यह कोटि के अनुरूप ब्लॉग पाठकों द्वारा ही 1 से 10 के पैमाने पर अंकित की जानी हो।
7) ब्लॉग का अद्यतन किया जाना – दैनिक, साप्ताहिक, पाक्षिक, मासिक, त्रैमासिक या अनियमित
8) ब्लॉग पर सबके लिए उपयोगी सामग्री जो कॉपीराइट उल्लंघन से परे, नि:शुल्क डाउनलोड हो सकती हो या चि्त्र, विजेट, टेम्प्लेट आदि जो अन्यत्र प्रयुक्त हो सकें।
यह बाध्यता भी हो कि मूल्यांकन के लिए मत उसी ब्लॉग-पाठक का गिना जाय जो मूल्यांकन अवधि में कम से कम पाँच बार, या प्रति पोस्ट एक बार, या प्रतिमाह कम से कम तीन बार (या ऐसी ही कोई सर्वसम्मत संख्या) तक कम से कम उस ब्लॉग पर जा कर टिप्पणी कर आया हो। बिना पढ़े या टिपेरे कैसा मत?
जो भी हो, अगर खेल होना है, तो नियम तय किए जाएँ, शुरू करने के पहले।
अब मेरे प्रश्न स्वयं से ही हैं कि-
1) क्या ब्लॉगरी स्वान्त: सु्खाय ही नहीं होनी चाहिए?
2) ज़्यादातर लोग जो ब्लॉगरी में लगे हैं, क्या वे अपनी किन्हीं महानता की अधूरी रह गयी इच्छाओं की पूर्ति के लिए आए हैं, या बस अच्छा लगता है इसलिए? प्रोफ़ेशनल ब्लॉगर को यकीनन शौकिया ब्लॉगर से अलग देखना होगा।
3) क्या विभिन्न रैंकिंग्स जो दी जा रही हैं, तरह-तरह की सेवाओं द्वारा, वे ब्लॉगरों के अहम् की मानसिक तुष्टि के लिए पर्याप्त नहीं हैं?
शायद कुछ अन्तराल पश्चात् मैं अपनी राय स्थिर कर सकूँगा, और तब उत्तर भी ढूँढ लूँगा।
और अन्त में, अपनी व्यक्तिगत राय, जितनी स्थिर है, उसे भी व्यक्त कर दूँ।
मैं समझता हूँ कि मेरे लिए अच्छा पढ़ लेना ही पर्याप्त नहीं है, जिसके लिए अच्छे से अच्छे रचनाकारों की अच्छी से अच्छी कृतियों से बाज़ार, पुस्तकालय पटे पड़े हैं, उन्हें पढ़ने के लिए पूरा जीवन कम है और यहाँ तक कि नेट पर भी रुचि के अनुरूप सामग्री उपलब्ध है, नि:शुल्क भी। ऐसे में मुझे कोई मुग़ालता नहीं अपने लेखन को लेकर, न दूसरों के।
इसी से मैं ब्लॉग पर हूँ, वर्ना किसी के ब्लॉग पर जा कर पढ़ने के बाद टिप्पणी देने की क्या ज़रूरत? क्या मेरे प्रतिक्रिया न देने से लेखन की गुणवत्ता घट जाएगी? नहीं, मगर देने से बढ़ सकती है, सुधार हो सकता है। इसी से जो चटते हैं मेरे साथ चैट पर, वे मेरे दिल के ज़्यादा करीब आ चुके हैं, और उनकी कमियाँ अगर कोई हों तो उनसे मुझे फ़र्क नहीं पड़ता उनकी अच्छाइयों के आगे।
मेरे लिए शुरुआती दौर में भी ऐसा था, और बाद में भी, जो महत्व आपसी संवाद का है, हौसला बढ़ाने वालों का है, वह गुणवत्तापरक लेखन का न है, न हो सकता है। कौन से अध्यापक अच्छे लगते थे – जो स्वयं बहुत उच्च योग्यताधारक थे? या जिन्होंने अपनी कमियों को जीतना सिखाया? या जिन्होंने ख़ुद से ज़्यादा ऊँचाई तक पहुँचाने के लिए अपने शिष्य में उच्चतर योग्यता पैदा की? और उन अध्यापकों से पहले क्या वह माँ, बहन, बड़े भाई, चाचा याद नहीं जो आपकी ग़लती होने पर भी साथ ही खड़े हुए?
आदर्श कुछ भी हों, जो मेरा साथ दे, हर परिस्थिति में - मेरा अपनत्व भी उसी के साथ है, और इस संशयविहीन सोच पर मैं ख़ुश हूँ।
सबकी अपनी-अपनी सोच है, मगर मेरी सोच तो यही है कि -
प्यार तो करते हैं दुनिया में सभी लोग, मगर;
प्यार जतलाने का अंदाज़ जुदा होता है
कोई भी ठोकरें खा जाय तो गिर सकता है,
झुक के जो उसको उठा ले – वो ख़ुदा होता है
ब्लॉगरी की मान्यताएँ और उसूल वास्तविक जीवन से अलग नहीं हो सकते। मुझे यह स्वीकारना पड़ता है कि यदि मेरे अपनों की व्यक्तिगत उपलब्धियाँ कुछ कम भी हों तो भी मैं उन्हीं के साथ रहूँगा, व्यक्तिगत उत्कृष्टता का मोल पारस्परिक सहभागिता में उत्कृष्टता के आगे कम है मेरे लिए।
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(काव्यपंक्तियों के रचयिता:अज्ञात; सभी चित्र गूगल से साभार)