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Saturday, May 8, 2010

कंपनीबाग, इलाहाबाद

उसी उद्यान परिसर में विक्टोरिया स्मारक तथा गोल पार्क व अन्य क्रीड़ा मैदान। इसी परिसर मेँ मदन मोहन मालवीय स्टेडियम भी है।

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4 comments:

Rajey Sha said...

हम खुद से उन्‍हीं प्रश्‍नों का उत्‍तर पूछते हैं जि‍नके जवाब हमें पक्‍के होते हैं, इस बात का क्‍या अर्थ है मोहन जी ?

हिमान्शु मोहन said...

@ Rajey Sha
अर्थ तो सीधा सा है जनाब!
कि उम्मीद अभी कहीं दिल के किसी कोने में बाक़ी है, और उसी उम्मीद को एक दिलासा का सहारा दिलाने की कोशिश होती है ये, भले ही उम्मीद और दिलासा दोनों ही झूठे हों!

M VERMA said...

कम्पनी बाग का सुन्दर नज़ारा

प्रवीण पाण्डेय said...

उफ, ये तार कहाँ से आ गये बीच में ।