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Saturday, April 24, 2010

जीवन : वर्तमान, अतीत और भविष्य

"हम तो सिर्फ़ वर्तमान में जीते हैं - आज, अभी, यहीं। कल किसने देखा है!"
अक्सर लोग यह कह कर समझते हैं कि कुछ अच्छा बोला। ऊँची बात बोली, तो प्रशंसा की अपेक्षा भी होती है, और अगर आप ने प्रशंसा न की तो आप के मानसिक स्तर को निचले दर्जे का माना जाने की पूरी संभावना है।
वर्तमान में जीना अच्छी बात है, मगर भविष्य के लिए सोचना, भविष्य के लिए योजना बनाना कोई बुरी बात नहीं।
इसी तरह अतीत पर गर्व करके प्रेरणा पाना, संबल जुटाना और आत्मविश्वास बढ़ाना भी कोई अपराध नहीं।
बुराई अतीत में जीने में है, उस पर गर्व करने में नहीं। यह उतना ही बुरा है जितना भविष्य में जीना, सपनों में।
अतीत हमेशा गौरवशाली होता है और भविष्य स्वर्णिम, सबका। ऐसा ही होना भी चाहिए, वर्ना न तो प्रेरणा मिलेगी और न आत्मबल, जो सीधे जोड़ता है आत्मविश्वास से।
आशा और प्रेरणा ही यदि न रहें, तो जीवन की गति सिवा नैराश्य और असफलता के और कुछ नहीं हो सकती और यह परिणति अभीप्सित नहीं है।
इसलिए यह समझना ज़रूरी है कि यदि हम वर्तमान में जीने की कला सिखा रहे हैं अपनी अगली पीढ़ी को, यह कह कर कि "कल किसने देखा है?" तो हम उन्हें अधिक व्यावहारिक नहीं बना रहे - जिसे "प्रैक्टिकल" होना कहते हैं, वरन् हम अनजाने ही उन्हें संशयग्रस्त जीवन में ढकेल रहे हैं।
ऐसी स्थिति में कि वे अनिर्णय में झूलते रहें, न भविष्य को सँवारने का प्रयास कर सकें और न अपनी परम्पराओं व संस्कृति को पहचान कर उस पर गर्व कर सकें, अपनी पीढ़ी को जानबूझ कर कोई भी भेजना चाहेगा, ऐसा मुझे तो नहीं लगता।
यह मानसिकता बहुधा एक परोक्ष कारण बनती है नौजवानों के अवसादग्रस्त हो जाने, स्ट्रेस में आ जाने, रोगी हो जाने और नशाख़ोर-ड्रग एडिक्ट तक बन जाने में।
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2 comments:

जयकृष्ण राय तुषार said...

धन्‌यवाद सर! आपका चिट्‌ठा बहुत खूबसूरत है। अभी इस दुनियाँ मेँ मैँ नया हूँ।

arun c roy said...

himanshuji... aapke sangam tat par pehli baar aaya... kafi cheezo ke padha... kafi achhal likhte hai aap saath hi aaki soch bhi sakaratmak hai... shubhkaamnaaye! samay mile to humare blog par bhi padhare...