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Tuesday, April 20, 2010

याद आए

याद आए!

छू लिया मन को किसी की याद ने
याद आने पर किसी का ज़ोर क्या…
भूलने पर बस नहीं चलता मगर,
भूलना वरदान बढ़ती उम्र का।

भूल जाने के लिए सौ-सौ जतन
चाहने से कब भला कुछ भूलता…
याद रख कर बेकली हो या घुटन
भूल जाना चाहती है विवशता

गीत गाने के बहाने,
या चले जाना नहाने,
देर तक सोना सुबह को, रात जगना
कभी चुप रहना, कभी बेवजह हँसना…

सुरमई रातों जली-बुझती उदासी,
रोशनी फ़ुटपाथ से चुपचाप आए,
बगल तक आकर सिरहाने पसर जाती
और निगरानी करे।

और निगरानी करे चुपचाप जैसे
माँ बदन पर शाल डाले देखती हो
कब दुलारा आँख का तारा कि प्यारा
लाल उसका नींद में ही गिर न जाए…

और तिस पर यह उलहना …
और तिस पर यह उलहना
है कि कोई उसी माँ की
निगहबानी की वजह से
सो न पाए!
रोशनी चुपचाप फिर आए सड़क से…

नींद में तकिया गिरा या हटी चादर,
गई बिजली और टूटे पड़े मच्छर
नींद ऐसी…
नींद ऐसी कौन जगता था जगाए!

अब असुविधा से बचाने
के लिए हैं कई साधन
हों भले सामर्थ्य में, उपलब्ध भी, पर,
मुद्दतें गुज़रीं सुखों की नींद आए।

अर्थ की महिमा चतुर्दिक, शब्द फैले जाल जैसे
लालची हैं, फँस रही हैं, मछलियों सी भावनाएँ
नहीं हो यदि 'अर्थ' तो संघर्ष जीवन,
किन्तु यदि बस 'अर्थ' हो तो व्यर्थ हैं संवेदनाएँ।

लाल उसका नींद में ही गिर न जाए…
निगहबानी की वजह से सो न पाए!
रोशनी फ़ुटपाथ से चुपचाप आए!
नींद ऐसी कौन जगता था जगाए!
मुद्दतें गुज़रीं सुखों की नींद आए।
प्यार से लोरी सुनाए - माँ सुलाए!
'अर्थ' हो तो व्यर्थ हैं संवेदनाएँ

और अब यह हाल देखो…
याद भी आता नहीं दिन गए कितने-
भूल कर भी जो किसी की याद आए!
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3 comments:

Udan Tashtari said...

अर्थ की महिमा चतुर्दिक, शब्द फैले जाल जैसे
लालची हैं, फँस रही हैं, मछलियों सी भावनाएँ
नहीं हो यदि 'अर्थ' तो संघर्ष जीवन,
किन्तु यदि बस 'अर्थ' हो तो व्यर्थ हैं संवेदनाएँ।


-दो बार पढ़ गया पूरी रचना. बहुत ही उम्दा, बधाई.

हिमान्शु मोहन said...

@ Udan Tashtari
आभार! आपकी सहृदयता को पसंद आई होंगी पंक्तियाँ,
वर्ना रचना(कार) किस क़ाबिल है हुज़ूर!

संजय भास्कर said...

किस खूबसूरती से लिखा है आपने। मुँह से वाह निकल गया पढते ही।