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Saturday, May 8, 2010

अच्छी रचना वही जो रचने को उकसाए

मेरा अपना मानना है कि उत्तम कृति हमेशा कुछ और नया रचने की प्रेरणा देती है, बाद में याद आती है और हॉण्ट करती रहती है।
जितनी तीव्रता हो इन अनुभूतियों में, उतना ही उस चित्र, मूर्ति या रचना की गुणवत्ता ऊपर समझता हूँ मैं। यहाँ तक कि ईश्वर प्रदत्त रूप-शारीरिक सौष्ठव संबंधी सौन्दर्य हो या जीवन यात्रा में शनै:शनि: और क्रमश: विकसित व्यक्तित्व के गुण या सम्पूर्ण व्यक्तित्व, उसकी भी सार्थकता इसी में है कि वह सर्जना और कल्पना के नए आयामों को जन्म दे, नया कुछ रचने की उत्कण्ठा जगाए।
मैं अक्सर जब कोई रचना पढ़ कर आनन्दित होता हूँ तो तुरन्त वहीं उसी सोच और अन्दाज़ में कुछ रचने की कोशिश करता हूँ।

विचार करने पर बाद में मैंने पाया कि यह एक प्रतिक्रिया है मेरे अवचेतन की जो एक ओर तो यह जताती है कि मैंने भाव और सोच के उसी स्तर पर पहुँचने का प्रयास किया जिस पर रचना हुई, और दूसरे यह भी कि पढ़ी जा रही रचना इतनी अच्छी है कि प्रेरणा दे रही है, कुछ नया रचने जैसी।वास्तव में रचना को ठीक से समझ पाने की ही कोशिश है यह भी, उस रचना से सामञ्जस्य बिठाने की अवचेतन प्रक्रिया।
मगर दोस्त का कहना था कि यह स्पष्टीकरण साझा करना चाहिए मुझे। यह इसलिए साझा करना ज़रूरी है कि कभी किसी को यह खटक भी सकता है और नकल उतारने या चुनौती देने जैसा भी लग सकता है, जो उद्देश्य नहीं है, बिल्कुल नहीं है। अपनी इस आदत पर पहले कभी ध्यान नहीं गया मगर अब एक दोस्त के ध्यान दिलाने पर देखा तो बात मुझे तो कुछ अटपटी नहीं लगी। मैं अपनी ख़ुशी और पसन्द का इज़हार अगर ऐसे ही करता हूँ तो करता हूँ; इसमें अटपटा क्या है?
सो दोस्त के कहने से स्पष्टीकरण तो दे दिया,  मगर अपनी इस आदत को नहीं बदलूँगा मैं। एक तो ये मेरा रचना से आनन्दित होने का अपना तरीक़ा है, और तिस पर यही मेरी सहज प्रतिक्रिया की प्रक्रिया है।
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3 comments:

शरद कोकास said...

बिलकुल सही कहा आपने मेरा भी यही मानना है ।

प्रवीण पाण्डेय said...

लेखक वही जो अपने पाठकों को अपने चिन्तन के स्तर तक ले जाता है । पाठक वही जो उस स्तर को अपने में उतार ले ।

Amitraghat said...

बेशक सही कहा आपने , आपकी बात कहने की सहज शैली ही आपको अलग स्थान दिलाती है.."