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Friday, May 7, 2010

क्या हम समाज का अंग नहीं हैं?

कई दिन से यहाँ कुछ पोस्ट नहीं किया - जो पोस्ट यहाँ के लिए लिख रहा था वह अब बाद में आएगी। आज ज्ञानदत्त जी की ताज़ा पोस्ट पढ़ी-आशा और प्रयास के प्रति आस्था को सुदृढ़ करती हुई। जिज्ञासा बनी थी उनकी पिछली पोस्ट के बाद से - कि यारो अब क्या होगा?
जो लोग प्रवीण पाण्डेय के शब्दों में छ्लक जाने को आतुर हों, उन्हें छलकने से रोकने को प्रयत्नशील।
पोस्ट पढ़कर, टिप्पणी देकर ही चुका था कि नज़र पड़ गयी इस पोस्ट के लिंक पर, सो फ़ोन का झुमका देखने चला गया। पढ़ कर सवाल पैदा हुआ मन में - सो आप सब से शेयर करने को ले आया - कि क्या हम लोग भी समाज का हिस्सा ही नहीं हैं? अगर समाज-सेवा के लिए, समाज की बेहतरी के लिए हम प्रयत्न करना अच्छा समझते हैं तो व्यक्तिगत उन्नति के लिए प्रयास जल्दी क्यों बन्द कर देते हैं?
क्या ज्ञानदत्त जी को अपनी समस्या, जो उन्होंने साझा सरकार को अविश्वास मत से बचा ले जाने वाले "जुगाड़" से निपटा ली थी, उसके बाद भी निकम्मेश्वरों को चेताने के लिए आगे ठेलनी चाहिए थी या नहीं?
यह मैं स्पष्ट कर दूँ कि यह विभाग मेरे ही अधीन है, जिसे इस सुविधा के प्रदान करने का प्रबन्ध और यत्न करना था, मगर मेरी प्रतिक्रिया इसलिए नहीं - बल्कि इसलिए है -कि मैं स्वयं भी निजी मामलों में सक्रियता का स्तर इसी तरह कमज़ोर और नीचा ही रख पाता हूँ। आज तक मैं इस बात से स्वयं अनभिज्ञ था कि ऐसी कोई समस्या कभी कहीं उठी।
यानी समाज के लिए तो सब कुछ, और अपने लिए प्रयत्न क्यों नहीं? हम भी तो इसी समाज का अंग हैं - या नहीं हैं? अगर अपने को भी समस्या से उबारा - तो समाज के ही एक हिस्से की समस्या दूर हुई न!
मैं भी ऐसा ही कुछ करता शायद, जैसा और जो उन्होंने किया, शायद मैं उससे बहुत अलग कुछ नहीं करता, मगर प्रश्न उठा तो ले आया - सार्वजनिक कर दिया कि झुमका है, तो उसको गिराना भी तो पड़ेगा न!
अब झुमके के लिए मैं यही शुभकामना देता हूँ, कि बरेली के बाज़ार में गिरे या न गिरे,  यहीं गिरे या चाहे कहीं भी गिरे, मगर गिरे ज़रूर।
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2 comments:

ज्ञानदत्त पाण्डेय Gyandutt Pandey said...

झुमका मेरा बहुत कारगर जुगाड़ यंत्र है।
वह गिरेगा तो कैसा लगेगा?! :(

प्रवीण पाण्डेय said...

पैटेन्टेड है । गिरेगा भी तो कोई उपयोग नहीं कर पायेगा ।