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Friday, May 14, 2010

मद्यं शरणं गच्छामि : 'बच्चन' के बहाने

बच्चन जी की स्वयं चुनी हुई कविताओं संकलन पलट रहा था, “मेरी श्रेष्ठ कविताएँ”। अचानक एक पृष्ठ पर निगाह ठहर गयी – नीचे उद्धृत करता हूँ आपके रसास्वादन के लिए: (अंश: “बुद्ध और नाचघर” से)
जहाँ ख़ुदा की नहीं गली दाल, वहाँ बुद्ध की क्या चलती चाल?
वे थे मूर्ति के ख़िलाफ़ - इसने उन्हीं की बनाई मूर्ति,
वे थे पूजा के विरुद्ध - इसने उन्हीं को दिया पूज,
उन्हें ईश्वर में था अविश्वास - इसने उन्हीं को कह दिया भगवान,
वे आए थे फैलाने को वैराग्य, मिटाने को सिंगार-पटार - इसने उन्हीं को बना दिया श्रृंगार।
*  *  *  *  *  *  *
…सबके अंदर उन्हें डाल, तराश, खराद, निकाल
बना दिया उन्हें बाज़ार में बिकने का सामान।
*  *  *  *  *  *  *
शेर की खाल, हिरन की सींग
कला-कारीगरी के नमूनों के साथ - तुम भी हो आसीन,
लोगों की सौंदर्य-प्रियता को देते हुए तस्कीन,
इसीलिए तुमने एक की थी आस्मान – ज़मीन?
*   *   *   *   *   *   *
(अंत में – यह ज़िक्र करते हुए कि नाचघर में एक तरफ़ बड़ी सी बुद्ध की मूर्ति शोभायमान है, रंग-बिरंगे जलते-बुझते बल्बों के बीच रंगीली सज्जा में – और दूसरी तरफ़ लाइव-ऑर्केस्ट्रा के जाज़ पर जोड़े थिरकना शुरू कर चुके हैं…)
"मद्यं शरणं गच्छामि,
मांसं शरणं गच्छामि,
डांसं शरणं गच्छामि"
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इसी तरह एक अन्य पृष्ठ पर उनका फ़ुटनोट देखा -
"यह कविता और गीत – आकाशवाणी केन्द्र में इस दिन फीतांकित किए गए"
और मैं चौंका – टेप-रिकार्ड किए जाने का सार्थक सशक्त अनुवाद –“फीतांकन”! वाह!!
मैंने अब तक नहीं देखा कहीं भी यह प्रयोग।
मेरी अज्ञानता हो सकती है इसमें, मगर यही बातें तो एक सामान्य कवि को विशिष्ट बनाती हैं।
क्या ब्लॉगरी भी सप्रयास ऐसी ही समृद्धि दे नहीं रही हिन्दी को? बिना नारे लगाए भी, मुक्त और स्वच्छ्न्द यह हिन्दी आन्दोलन अब तक के सारे आन्दोलनों, सारे ***वादों और सारी धाराओं को पीछे छोड़ देगा, इसमें मुझे ज़रा भी संदेह नहीं।
और मुझे समझ में आ गया कि पुस्तक खरीदनी पड़ेगी - जबकि कविता पढ़ने को मैं अच्छी आदत नहीं समझता। वो भी ख़रीद कर–प्रवीण पाण्डेय के शब्दों में कहूँ तो - “शिव-शिव, हर-हर!”
*  *  *  *  *  *  *  *  *
मैंने पहले भी बहुत कविताएँ नहीं पढ़ी थीं उनकी, और विशेष रुझान भी नहीं था। इसी से उनका गद्य लेखन तो पढ़ा गया – बचपन में, जब समय ख़ूब रहता था मगर कविताएँ – उफ़्! कविता पढ़ना मुझे उबाऊ काम लगता था, और लगता है।कविता सुनना अच्छा लगता था, मगर कुछ ख़ास तरह की, और गेय।
बाद में प्रसाद जी की कविताएँ अच्छी लगीं, निराला की भी। पन्त और महादेवी जी की कविताओं के प्रति वैसा रुझान कभी उत्पन्न नहीं हुआ। महादेवी जी का गद्य भाता है। फिर बिहारी, गुलज़ार, रसखान जमे। फिर मैं समझ पाया कि मेरी पसन्द छोटी, उक्ति-वैचित्र्य से भरपूर और व्यंग्य या तंज़ से भरपूर रचनाओं के प्रति है। आनन्द और दिल तक पहुँचना ज़्यादा ज़रूरी है मेरी पसन्द के लिए।
काका ‘हाथरसी’ जमते थे। उनकी कविताएँ याद करनी पड़ीं, क्योंकि पाँच साल की उम्र में ही उनका रोल अदा करना पड़ा था मुझे, स्टेज पर। वहीं से स्टेज की सवारी शुरू हुई थी, जो अभी जारी है।

Monday, May 10, 2010

मेरे नए ब्लॉग अनुभव

कुल मिला कर बीते दिनों को याद करके हँसी आ रही है।
बीते दिनों को याद करके कोई हँसता है, कोई रोता है। जिसे लगता है कि “कितनी बेवकूफ़ी की बीते दिनों!” - वो हँसता है। जिसे लगता है कि बेवकूफ़ी बीते दिनों नहीं हुई, अब हो रही है, वो नहीं हँसता।
HM CHARLIE Sसबसे पहले तो हँसी आती है अपनी समझ पे - बज़ देखी, कमेण्ट किया या आगे बढ़े और उस कमेण्ट के बाद सब बज़ को म्यूट कर देता था मैं। मज़े की बात ये है कि अब भी मैं बज़ से आगे बढ़ते ही म्यूट कर देता हूँ, क्योंकि मुझे पता नहीं कि और क्या करना चाहिए बज़ का। ज्ञानदत्त जी ने अभी पिछले हफ़्ते पूछा कि मैंने “अपने ब्लॉग बज़ से तो जोड़े हैं न?” तो कबूलना पड़ा कि “नहीं”। पता ही नहीं था कि कैसे जोड़ूँ। अब तो कुछ सीखा और कर लिया पिछले रविवार को।
फिर एक पुरानी बज़ जिसमें मैंने अपने अनुभव इसी तरह दर्ज किए थे, उसको पा गया बज़ को टटोलने में। बहुत से कमेण्ट थे – सलाहें थीं कि इसे पोस्ट बना देना चाहिए। मैं बज़ म्यूट करके मस्त था! कुछ पता नहीं था कि कितनी बड़ी अभद्रता कर रहा था – अजाने में। सो अब यह पोस्ट पर ही दर्ज कर रहा हूँ और लिंक सहित (देखिए मैं सलाह पर अमल करता हूँ – अच्छे बच्चों की तरह!)।
फ़ॉलो करने वालों के ब्लॉग पर जाना आसान होता है। यही सोच कर फ़ॉलो करने वाला विजेट लगा लिया अपने ब्लॉग पर, ऊपर ही। नतीजा – प्रवीण त्रिवेदी जी, माणिक का माणिकनामा, पद्मसिंह जी का पद्मावलि और (पद्मसिंह जी का साथ पहले ही कुछ प्रगाढ़ लगता है, शुरूआत के साथी हैं न!) दिलीप जी का ब्लॉग तथा प्रणव के अमित्राघात पर जाना आसान हो गया मेरे लिए। कुछ ब्लॉग हटाए भी - जिन पर मैं कुछ पसन्द का नहीं पा रहा था, और जिन पर नई सामग्री नहीं थी। गूगल रीडर पर मुझे आसान नहीं लगा मनचाहे ब्लॉग पर जाना।
आराधना और स्तुति पाण्डेय दोनों ब्लॉग पर भी सक्रिय हैं और बज़ पर भी। अजीब सी आदत होती है लड़कियों की - लड़कियाँ चाहती हैं कि उन्हें कोई छेड़े - तभी तो पहले बताती हैं कि उन्हें चिढ़ किस बात से है, फिर चिढ़ाई जाने पर ख़ुश होती हैं। ये बात मैं अपने बचपन से नोट कर रहा हूँ, ज़्यादातर दीदियाँ तब भी ऐसी ही होती थीं, अभी भी मेरी बेटी पहले अपने भाई से ख़ुद ही कुछ शेयर करेगी, फिर उसी पर घमासान छिड़ेगा।आराधना का ब्लॉग, भानुमती का पिटारा - स्तुति पाण्डेय, ई-गुरू राजीव उर्फ़ आरएनडी, प्रवीण त्रिवेदी मास्साब के ब्लॉग, शेफ़ाली पाण्डे का कुमाऊँनी चेली इन सब पर मैं नियमित जाता रहता हूँ, अक्सर अच्छा पढ़ने को मिल जाता है यहाँ। मन हुआ तो टिप्पणी भी करी – न हुआ तो न करी।
और ब्लॉगर जो नज़र में आए, उनमें हैं अदा जी जिनके ग़ुरूर, अदा और हुनर का परस्पर संबंध अन्योन्याश्रित है, मगर मेरी नज़र में तो उनके लाडले मयंक की रेखाएँ बसी हैं - कृष्ण! प्रकट ही हो गए आप तो मयंक की रेखाओं में! उनकी काव्यमञ्जूषा भी खोल के देख आता हूँ कभी-कभी। पिछले दिनों कुछ खिन्न सी थीं, ब्लॉगजगत की किन्हीं घटनाओं से; मुझे अच्छा लगा कि मैं पूर्णकालिक ब्लॉगिया नहीं हूँ – मेरे पास अपने सरदर्द पहले ही कम नहीं हैं। अब यशोधरा पर एक अच्छी रचना लाई हैं आज मदर्स डे पर।
अरविन्द मिश्रा का क्वचिदन्यतोऽपि, अमित्राघात, ज्ञानदत्त पाण्डेय जी की मानसिक हलचल – मेरी हलचल उन्होंने इस बीच शुरू किया और स्थगित भी कर दिया, प्रवीण पाण्डेय और उनका ब्लॉग प्रवीण और ज्ञान पाण्डेय, शिवकुमार मिश्रा और ज्ञानदत्त पाण्डेय का ब्लॉग परिष्कृत रुचि की माँग को पूरा करते हैं और हिन्दी ब्लॉग में प्रवीण पाण्डेय जैसे और ब्लॉगियों की ज़रूरत है, उसे समृद्ध बनाने और विश्वस्तर का बनाने के लिए। और भी ऐसे ब्लॉगिये हैं, मगर प्रवीण की तरह अपने स्तर का निर्वहन करते रह पाने में देखें कब तक ये सब सक्षम रहते हैं। शरद कोकास भी गुणवत्ता का उच्च स्तर बनाए रखते हैं, और संवाद में भी रहते हैं। फुरसतिया के बारे में भी यही राय है कि वह स्तरीय लेखन करते हैं, और जब ठेलुअई करते हैं तो वह भी स्तरीय।
रानी विशाल का काव्यतरंग, माणिक का माणिकनामा बढ़िया हैं। रतन सिंह शेखावत का ज्ञान-दर्पण बहु्त काम का ब्लॉग है, हिन्दी तक सीमित ब्लॉगरों के लिए। प्रियदर्शिनी तिवारी शौकिया लिखती हैं, अनियमित हैं मगर अच्छा लिखती हैं। जिन्न्श वाला लेख तो कमाल था। ताऊ का अड्डा भी बड़ा रोचक है और अपनी रोचकता भी बनाए हुए है और सरोकार भी। प्रणाम इसी बात पर। बस ये नहीं जान पाता कि ये चिम्पैंज़ी की खाल का बुर्क़ा ओढ़े रहने वाला ताऊ है कौन?
इयत्ता, चोखेर बाली – वन्दना पाण्डेय, अन्जना का ब्लॉग - पॉवर,  व्योम के पार-अल्पना वर्मा, वन्दना अवस्थी 'दुबे' की अपनी बात और किस्सा कहानी इन सब पर पढ़ने को अच्छी सामग्री मिलती रहती है। एक चर्चा मंच है जहाँ कृति देव से यूनिकोड में और उल्टा परिवर्तन संभव है, वहीं दाएँ हाशिए में इसका लिंक है। मैं वन्दना गुप्ता जी के संदर्भ से पहुँचा था यहाँ। वन्दना जी के ज़ख़्म जो फूलों ने दिये,  ज़िन्दगी……एक ख़ामोश सफ़र और एक प्रयास तीनों ही अच्छी रचनाओं के ठिकाने हैं, मगर उनकी अपनी ही रचनाएँ क्रॉस-पोस्ट भी होती हैं इन पर।
बहुत रंगीन से कई लेबल लगे होते हैं जहाँ- वहाँ से मैं जल्दी ही भाग लेता हूँ। ईमानदारी से स्वीकार करता हूँ मुझे सज्जा करनी नहीं आती – मेरे ब्लॉगों की थीम भी ज्ञानदत्त जी ने सहेज दी है – सो लगी है।
वास्तव में यह सहजता, मृदुता और नए ब्लॉगियों को प्रोत्साहित करने का बड़प्पन ही “उड़नतश्तरी” tn64समीर लाल जी और ज्ञानदत्त जी को वह दर्जा दिलाए हुए है जिस तक पहुँचने के लिए सिर्फ़ एक अच्छा ब्लॉगिया  ही नहीं, और भी बहुत कुछ होना पड़ता है। उड़नतश्तरी आप के यहाँ से गुज़रेगी सर्रर्रर्रर्रर्र और टिप्पणी कर के आप को दे जाएगी ऑक्सीजन आपके ब्लॉग को जिलाए रखने के लिए – जब तक आप यह प्राणवायु देना स्वयं न सीख लें –या जब तक उड़नतश्तरी दुबारा सर्राटा न भरे…!
अमित्राघात पर नई रचना बहुत ख़तरनाक हालात को बयाँ करता हुआ सशक्त ताना है, समाज की महिलाओं के प्रति संवेदनहीनता और दोहरे मापदण्डों के प्रति।
पंकज उपाध्याय ने ग़ज़ब ढा दिया है अपनी नई पोस्ट में- मेरे विचार मेरी कविताएँ पर। कभी गुमसुम, कभी उदास और मासूम, कभी रंगीला-छ्बीला ये लड़का मेरी नज़र में लड़कियों के लिए एक सॉफ़्ट टारगेट है – एलिजिबुल कुँआरा और जैसा है वैसा होने के नाते। अरे पण्डितो! और कुँआरी कन्याओ! मौसियो! चचाओ! पकड़ो – जाने न पाए!
पीडी - मेरी छोटी सी दुनिया और कॉमिक्स, ललित शर्मा ललितडॉटकॉम, अजित वडनेरकर का शब्दों का सफ़र, सुख़नसाज़, सुख़नवर2सुख़नवर, संजीत त्रिपाठी का ब्लॉग सब बहुत अच्छे लगे। पीडी यानी प्रशान्त प्रियदर्शी की लेखनी में तो दम है ही, उन्होंने बड़े-बड़ों को बच्चा बना दिया, और यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि मेरी कॉमिक्स पढ़ने की प्यास अभी भी अधूरी ही है।
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी, अरुणेश जी और झनकार के ब्लॉग तथा राजे शा का हँसना मना है,  भी अच्छे लगे। संजीव तिवारी जी की पत्रकारिता स्तरीय है। सुमन “nice” जी को कौन भूल सकता है? बहुत-बहुत धन्यवाद उनके प्रोत्साहन के लिए। इसके साथ ही एक आनन्द का ब्लॉग देखा था जो संस्कृत में था, शायद इन सबको फ़ॉलो करना भूल गया या शायद लिंक हट गया - तभी इस समय लिंक नहीं मिल रहा। बाद में ढूँढ कर लगाऊँगा।
राकेश कौशिक जी का हृदय-पुष्प, पूनम जी का झरोखा, शारदा अरोरा जी का गीत-ग़ज़ल, ज़िन्दगी के रंग  सब बहुत अच्छे लगे मुझे। शारदा जी को चेतावनी दे आया था कि उनकी कोई रचना –या यों कहें कि उनका “आइडिया” चुराऊँगा किसी दिन, अभी चुराना शेष है।
शरद कोकास का ब्लॉग एक ऐसा ब्लॉग है जहाँ जाकर कभी निराश नहीं लौटना पड़ा। ज़ाहिर है कि ये भी न केवल अच्छे रचनाकार और कवि हैं, बल्कि साथ ही अच्छी चयन की समझ भी रखते हैं। अनूप शुक्ल ही फुरसतिया हैं ये जानने में देर लगी,जब से मैंने प्रोफ़ाइल देखना शुरू किया तब जाना। फ़ोटो लगाते हैं ब्लॉग पर, मगर प्रोफ़ाइल पर नहीं–शायद फ़ुर्सत न मिली हो! :)
ग़ज़ल के बहाने - श्याम सखा ‘श्याम’ जी के ब्लॉग पर जाना सुखद रहा, श्रद्धा जैन की भीगी ग़ज़ल तो ख़ैर भिगोती ही है। नीरज गोस्वामी का ब्लॉग, कुमार ज़ाहिद का ब्लॉग, गौतम राजरिशी का “पाल ले इक रोग नादाँ”;  पंकज सुबीर की कुछ प्रेम कथाएँ, सर्वत इण्डिया, वीनस केसरी और उनका ब्लॉग आते हुए लोग, पद्म सिंह, अर्श, मुफ़्लिस और उनका तर्ज़-ए-बयाँ, शाहिद मिर्ज़ा ‘शाहिद’ के जज़्बात ये सब ग़ज़ल से जुड़े अच्छे ब्लॉग हैं, मुझे पसन्द हैं। सतपाल ख़याल बड़ी मेहनत से काम कर रहे हैं आज की गज़ल पर।
जिन्हें मैं लगातार गूगल बज़ पर ही पढ़ता रहा हूँ (कभी-कभी ब्लॉग पर भी जाना होता है) वे हैं दिनेशराय द्विवेदी जी-बज़ पर और अजय झा जी भी-बज़ पर। द्विवेदी जी का संस्मरणात्मक और वर्णनात्मक लेखन उम्दा और सहज है और विधि के तो विशेषज्ञ वे हैं ही।
अविनाश वाचस्पति जी- नुक्कड़ पर, संगीता पुरी जी का गत्यात्मक ज्योतिष जिन्हें मैं लगातार पढ़ता रहा हूँ ऐसे नियमित और अच्छे ब्लॉग हैं। इन्दु पुरी गोस्वामी जी का ब्लॉग भी बहुत रोचक और प्रेरणास्पद बना रहता है, बाक़ी स्वयं वे “हक़ से माँगो प्रिया गोल्ड” टाइप लगीं। अपनी बात पूरे हक़ और अपनत्व से कहती हैं; कोई बनाव-दुराव-छिपाव नहीं – सीधा-सरल व्यवहार। हरकीरत ‘हीर’ एक अत्यन्त सशक्त हस्ताक्षर हैं कविता के सभी पृष्ठों पर। अनुवाद में भी उनका योगदान है, मैंने अभी देखा नहीं सो कैसे कहूँ उस बारे में?
जो नए जोड़े -
गुलज़ारनामा,  दिव्या का ब्लॉग, निशान्त मिश्रा का ब्लॉग से ज़्यादा मज़ेदार योगदान ट्विटर पर मिलता है मुझे – यू-ट्यूब लिंक के रूप में। अन्य भी कई ब्लॉग और उनके रचनाकारों का ज़िक्र बाक़ी है, जैसे स्वप्निल कुमार “आतिश” का “कोना एक रुबाई का”, चौधरी, अनामिका की सदाएँ, अनिल कुमार “हर्ष” आदि; सुलभ सतरंगी, पारुल मगर अब अगर आज ही सब को लिख सका तो फिर अगली बार क्या लिखूँगा?
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इस पोस्ट में यदि किसी को कुछ आपत्तिजनक लगे तो मुझे क्षमा कर दें। ये मेरी अपनी राय है, बदल भी सकती है और नहीं भी। मगर ये किसी दूसरे की राय नहीं है, अत: ईमानदारी से सारी ज़िम्मेदारी मेरी अपनी है। वैसे भी मेरी अकिंचन राय से किसी को क्या फ़र्क पड़ सकता है?
स्वार्थपरक निजी कारणों को मैं सार्वजनिक किए देता हूँ : मुझे अपने पसन्दीदा ब्लॉग ढूँढने के लिंक एक जगह मिल जाएँ इस उद्देश्य से मैंने लिंक इकट्ठे किए, और राय इसलिए दर्ज की कि बाद में देखूँ और हँस सकूँ – कि इस समय मैं क्या सोचता था! (और इस बारे में बज़ पर मिली सलाहों का ध्यान रखने की पूरी कोशिश भी की है)

Monday, April 26, 2010

सार्थक क़दम

 आज कुछ सार्थक प्रयास नज़र में आए। ज़रूरी लगा कि उन्हें साझा किया जाए और ये कोशिश की जाए कि इनकी गूँज जाए ज़रूर, बाक़ी मेरा पैग़ाम जहाँ तक पहुँचे।
Pix0595पहला प्रयास तो लगा एक डाक में मिला लिफ़ाफ़ा, दक्षिण पूर्व रेलवे से (चित्र बाएँ)।
एक आम लिफ़ाफ़ा जो सरकारी डाक में प्रयोग में लाया जाता है, वह इससे लगभग तीन गुना बड़े आकार का होता है, जबकि अधिकांश पत्र इस आकार के लिफ़ाफ़े में भेजे जा सकते हैं।
हो सकता है कि इस प्रयास को पर्याप्त प्रचार मिला हो, बहुत प्रोपेगैण्डा हुआ हो, हो सकता है प्रचार न भी मिला हो।
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आज मेरी नज़र से यह लिफ़ाफ़ा पहली बार गुज़रा तो मुझे इसे साझा करना ज़रूरी लगा कि शायद और भी कई लोगों को यह प्रेरित कर सके, ऐसे ही और प्रयासों के लिए।
यह अपारम्परिक आकार काग़ज़ की बचत और तदनुरूप पर्यावरण के प्रति बेहतर तो है ही, जहाँ तक हम काग़ज़ को पूरी तरह हटा नहीं पा रहे। तुलनात्मक आकार के लिए दाएँ का चित्र देखें।
दूसरा सार्थक प्रयास है राजभाषा समिति की मंत्रालय के स्तर पर हुई बैठक के सार–अंश। यह ध्यान तुरन्त गया कि समिति के सम्मनित सदस्य / सदस्या तो कह रहे हैं कि कठिन शब्दों के प्रयोग से बचा जाय, मगर हमारे हिन्दी के रंग में रंगे कर्मी निर्देश लिख-बाँट रहे हैं –“क्लिष्ट  शब्दों का प्रयोग न हो”। Pix0597
भाई मेरे, ‘क्लिष्ट’ अपने आप में ही क्लिष्ट नहीं है क्या? यहाँ ‘कठिन’ से भी काम चल सकता था, जो आसानी से समझ में आता है। नहीं तो क्लिष्ट को दुरूह कहें और अधिक बोधगम्य शब्दों का प्रयोग कह कर और भी मुश्किल बना दें। अगर ‘मुश्किल’ ही लिख दें तो क्या हर्ज़ है?
तीसरा सार्थक क़दम, जिसके बारे में कुछ कहने की ज़रूरत ही नहीं, चित्र सब कुछ स्वयम् ही कह रहा है, नीचे देखें-
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चित्र थोड़ा और बड़ा होता तो और आसानी से समझ में आता, मगर मैं थोड़ी सी व्याख्या कर देता हूँ सहायता के लिए। सबसे ऊपर एक पोस्टर है, जिसका कैप्शन है - “आपके बच्चे का भविष्य आपके हाथ में है”। (यहाँ बच्चे को ही हाथ में दिखाना विज्ञापनीय टोटका ही लगता है)
बाक़ी पोस्टर के नीचे, उसके बाएँ, फिर और बाएँ देख कर समझा जा सकता है। वैसे मुझे लग रहा है कि भले ही किसी का भविष्य किसी के भी हाथ में हो, जान और वर्तमान तो शायद इस वाहन के चालक के हाथ में ही है, जो सवार हैं उनका भी, और जो आगे-पीछे-सामने चल रहे हैं उनका भी।
चौथा सार्थक क़दम मैं उठा रहा हूँ, अपनी बक-बक बन्द करके।

Tuesday, April 20, 2010

ज़िन्दा रहना एक विसंगति

ज़िन्दा रहना मौत का इन्तज़ार भी हो सकता है।
मौत को भी जिया जा सकता है।
सन्नाटे को सुनने वाले ख़ामोशी की आवाज़ पहचानते हैं। भीड़ में तन्हा हो जाने वाले अक्सर गुम हो जाते हैं। जो अकेले होते हैं, वो अक्सर मेले में पाते हैं ख़ुद को-यादों के।
सूखे की पीड़ा में अक्सर आँखें गीली हो जाती हैं और बाढ़ में फँसने पर हलक सूख जाना आम बात है।
शब्दों से खेलने वाले अर्थ (धन के अर्थ में भी) के लिए अक्सर तरसते पाए जाते हैं और जहाँ अर्थ भावों की गूढ़-गंभीरता पहले से लिए हों, वहाँ शब्द अक्सर ढूँढे नहीं मिलते।
* * * * * * * * *
रोना अच्छी बात है। न रोना ख़राब। न रो पाना और भी ख़राब, बल्कि असह्य। न रो पाने वाला दया का पात्र होता है।
हँसना अच्छी बात है।
ख़ुद पर हँसना-सबके बूते का नहीं।
दूसरों पर हँसना-मानवीय कमज़ोरी है।
दूसरों पर हँसना मगर दूसरों के हँसने पर परेशान होना-कि कहीं ये मुझ पर तो नहीं हँस रहे-ख़राब बात है्।
दूसरों पर हँसना, ख़ुद पर भी हँसना, ख़ुद पर न रोना, दूसरों के हँसने पर साथ देना चाहे वो लोग ख़ुद आप पर ही हँस रहे हों और उन्हीं लोगों के रोने पर सहानुभूति बनाए रखना ये दूसरों को परेशान किए रखने की आसान तरक़ीब है।
* * * * * * * * *
जो समझ गया, वही पागल है। जिसे लगता है कि वह सब समझ रहा है - वो नासमझ। कबीर के हिसाब से तो जितने जी रहे थे वो पहले ही मर चुके थे और जो निश्चिन्त मरे - वही जी पाए।
विसंगति में ही विशिष्ट और सम्यक् गति है। यानी जब 'विशिष्ट' और 'सम्यक्' दोनों एक साथ हों - तो विसंगति।
क्या जो विशिष्ट हो उसे सम्यक् न होने दें और सम्यक् को विशिष्ट?
समाज के नैसर्गिक नियम तो ऐसे ही हैं - सम्यक् को विशिष्ट न बनने देने के।
इसी हिसाब से विसंगति को विचारकों की विशिष्ट पहचान भी समझा जा सकता है।
जब संगति ही विसंगति से हो जाए तो फिर?
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आराधना की परछाइयों वाली पोस्ट तो पढ़ी ही होगी आपने। आज टिप्पणी करने गया तो वहाँ से लिंक लेकर अनूप शुक्ल 'फ़ुरसतिया' जी  की तरफ़ चला गया।
उनकी पुरानी जनवरी 13, 2008 की पोस्ट पढ़ी जिसमें 9 जनवरी की घटना का ज़िक्र करते हुए उन्होंने एक जीवनगाथा फ़्लैश-बैक में समेट दी है। जिन हालात में उन्होंने लिखी होगी ये पोस्ट, उस समय इतना और ऐसा लिख पाना, धन्य हैं प्रभु!
प्रभु दर्द भी सोच-समझ कर देते हैं - उसी को, और उतना ही - जितना सह पाए।
पूरा संदर्भ तो उनकी पोस्ट से नहीं मिलता, मगर पता नहीं क्यों ऐसा लगा - "रो पाने" पर अपने ख़्यालात की वजह से (शायद) ऐसा लगा कि समय आ गया है मेरी इस पोस्ट के छपने का, अब जैसी भी है - आज ही, अभी ही भेज रहा हूँ ब्लॉग पर। …

Monday, April 5, 2010

अपेक्षाएँ : ब्लॉगरी से और संचार माध्यमों से

अपनी पढ़ी पुस्तकों में से जिन पुस्तकों को मैं सबसे ज़्यादा प्रभावकारी मानता हूँ, उनके नाम लिखने चाहे, याददाश्त के आधार पर तो ये नाम याद आए-
अनलिमिटेड पॉवर (अन्थोनी रॉबिन्सन), सर्वाइवल ऑफ़ द सिकेस्ट (डॉ0 शैरोन मोलेम और जोनाथन प्रिंस), राग दरबारी (श्रीलाल शुक्ल), ब्लिंक (मैल्कम ग्लैडवेल)…कि अचानक ठिठक गई मेरी कलम। क्या भारतीय भाषाओं में चमत्कारी पुस्तकों का टोटा है? या फिर भारतीय नॉन-फ़िक्शन लेखन में पीछे हैं?


खोज-परक या विश्लेषण-परक पुस्तकें या लेख भी विश्वस्तरीय नहीं मिलते मुझे भारतीय लेखकों के। हो सकता है मेरी जानकारी, मेरा परिदृश्य का मूल्यांकन वास्तविकता से परे हो, मगर अंग्रेज़ी को छोड़ अन्य भारतीय भाषाओं में तकनीकी दृष्टि सहित तथ्यपरक लेखन भी कम ही दिखता है।


यह तो भला हो ब्लॉगरी का जिसने अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता को नए आयाम दिए हैं। छ्पास और व्यावसायिक लेखन से परे यह एक ऐसा पटल भी है जो उन्हें सीधे जनता से जुड़ने दे रहा है जिनके पास जानकारी है, जज़्बा है मगर संसाधन कम हैं, ख़ासकर समय।


एक औसत अच्छे लेख या पुस्तक से जो शोहरत या आमदनी मिल सकती है, उसके प्रति ज़्यादा रुझान नहीं ऐसे लेखकों का क्योंकि उनमें से कई उससे ज़्यादा पहले ही कमा रहे हैं। उन्हें प्रेरित करती है ब्लॉगरी की चुनौती, यहाँ अपना योगदान देने को, ख़ुद को आज़माने और हिट हो जाने को। ब्लॉगरी का एक अहम् कारण अपने को अपने जैसी सोच के लोगों से जोड़ने और एक सामाजिक समूह बनाने की भावना भी है, मगर चर्चा यहाँ लेखन पर है, ब्लॉगरी के कारणों पर नहीं।


यह चुनौती है सीधे प्रतिक्रिया झेलने की। जैसे स्टेज की चुनौती फ़िल्म से अलग तरह की है, यहाँ कीचुनौती स्टेज से भी बड़ी है।


ऐसे समझें कि फ़िल्म में आपको बार-बार दुहराव के बाद भी आपका सर्वोत्तम एक बार तैयार करना और संपादित करना सुलभ है, स्टेज पर आप उसी नाटक को अगली प्रस्तुति के लिए हर दुहराव के साथ तो बेहतर कर सकते हैं, पर अभी तो जैसा भी परफ़ॉरमेंस दिया, उसी के अनुसार प्रतिक्रिया मिलेगी और आकलन होगा। अगर सर्कस से तुलना करें तो वहाँ जैसे ही आपके आइटमों का नयापन ख़त्म हुआ, आपको अपना डेरा-तंबू उखाड़ कर नए दर्शक तलाशने पड़ते हैं। स्टेज इसीलिए 'खेल' की तरह है और नाटक 'खेला' जाता है, सिनेमा या सर्कस 'खेले' नहीं जाते।


यहाँ ब्लॉगरी में आपको गुणवत्ता बनाए रखकर, सतत रचनाशील रहना पड़ता है और दुहराव की गुंजाइश 'न' के बराबर होती है। प्रतिक्रिया तुरन्त और आप कठघरे में। दुहराव 'न' कर पाना इसे स्टेज से अलग - सर्कस के गुण बख़्शता है।


जो बपुरा बूड़न डरा - सो क्या ब्लॉगरी करेगा? मगर साथ ही जो बात आपने ब्लॉगरी मंच पर कही 'इधर', 'उधर' वह तुरन्त ही प्रसारित हो गई, द्विपक्षी वार्तालाप के लिए। जनमत संग्रह, जनमत विवेचना और जनमत अनुकूलन के लिए यह ग़ज़ब का प्रभावशाली माध्यम है। इसीलिए मुझे ब्लॉगरी से उम्मीद है कि चमत्कारी लेखन की भारतीय भाषाओं में कमी को यही ब्लॉगर दूर करेंगे।


इलेक्ट्रॉनिक संचार माध्यम जो आपके समय और सुविधा से समझौता करके आपके दरवाज़े ही नहीं, आपकी मेज़ (डेस्कटॉप), आपकी गोद (लैपटॉप) हथेली (पामटॉप) से होता हुआ आपकी जेब तक आ घुसा है (मोबाइल सेलफ़ोन पर) वह है ब्लॉग। आप अपनी सुविधा से कहें (या लिखें, वीडियो/ ऑडियो/ चित्र भेजें), मैं अपनी सुविधा से पढ़ूँगा या देखूँगा और अपनी प्रतिक्रिया दूँगा।


अभी भी इसकी पूरी शक्ति का दोहन तो क्या, दशांश भी उपयोग नहीं कर पा रहे हैं हम। फ़िल्म, राजनीति ही नहीं, विक्रयशील हर चीज़ या बात को आना होगा सीधे जुड़ने के लिए, अपने लक्ष्यगत उपभोक्ताओं के पास।


मुझे तो लगता है कि अगले चरण में, जो बहुत दूर या देर से नहीं होगा, टाटास्काई या अन्य डिश-टीवी जैसी डायरेक्ट-टू-होम सेवाओं को अपने 'प्लस' वर्शन में एक-आध 'प्लस' और जोड़ कर आना होगा अपनी एक्टिव सेवाओं में ब्लॉग भी जोड़ कर। जब ब्लॉग पर जाने के लिए आपको मोबाइल, लैपटॉप की नहीं, सिर्फ़ अपने डिश-टी-वी रिमोट भर की ज़रूरत पड़ेगी।


इस सूचना क्रांति के युग में आप मुझे देरी के लिए माफ़ कीजिएगा अगर आप जब यह ब्लॉग पढ़ रहे हों तब तक ऐसी सेवाएँ शुरू भी हो गई हों।

Saturday, April 3, 2010

बौराने का परिणाम


जो बौराते उनको अक्सर फलना पड़ता है
मीठी अमिया भी पहले खट्टी ही फलती है
* * * * * * * * *
ग़ज़ल की शक्ल पाकर ये शेर जल्दी ही हाज़िर होगा, संगम-तीरे पर
ग़ज़ल, वादे के मुताबिक हाज़िर हुई - अप्रैल 4, 2010 को।

Friday, March 26, 2010

कुमुक मोर्चे पर


जंग छिड़ने ही वाली है (गर्मी से), कुमुक (कूलरों की शक्ल में) मोर्चे पर पहुँच चुकी है। रसद (पानी-बिजली) का पता नहीं क्या होगा इस बार जंग के दौरान।
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Tuesday, March 16, 2010

नवरात्रि : देवी दर्शन और पूजन

ज़रा ध्यान से देखिए।
कुछ दिखा?
ज़रा चित्र पर क्लिक कीजिए - शायद पूरे आकार में देखने पर दिखे-
यक़ीन कीजिए, मैं अंधविश्वास नहीं फैला रहा।
मैं तो विश्वास जगाना चाहता हूँ।
कोशिश कर के देखिए - हाँ, अब जो धुँधली सी आकृति आप को दिख रही है, यही देवी का वह रूप है जिसके मुझे दर्शन हुए। इसके पीछे ही देवी का एक अन्य रूप भी है, जो मुझे तो दिख रहा था मगर कैमरे की नज़र में दर्ज नहीं हो पाया। अन्य चित्र जो कुछ दिखा रहे हैं वह कम्प्यूटर बाबा की महिमा और संपादन का करिश्मा है।

यह तीन-चार साल की छोटी सी कन्या है। प्रचलन के अनुसार नवरात्रि के दौरान इसे भी शायद देवी के बालरूप में पूजित किया जाएगा और जलेबी-दही, पूड़ी-हलवा आदि खिला कर लोग अपनी श्रद्धा व्यक्त करेंगे।
पीछे खड़ी है इसकी बड़ी बहन, जो अपने इस घर में, सड़क के नल से पानी भर कर रख रही थी, जो रोशनी की कमी से दिख नहीं रही यहाँ। उसकी उम्र लगभग आठ-एक साल रही होगी। मैं सड़क पर खड़ी गाड़ी में बैठा प्रतीक्षा कर रहा था अन्य साथियों की।

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बड़ी बहन लगातार सड़क के नल से घर के विभिन्न बर्तनों में पानी भर कर रखती जा रही थी और साथ-साथ सिखाती जा रही थी गिनती - अपनी इस नन्हीं-मुन्नी बहन को - पहले 1 से 100, फिर वन टू हण्ड्रेड, और फिर ए, बी, सी …
बड़ी बहन पहले बोलती थी - "इक्यासी" और छोटी दुहराती थी-"इक्याशी"।
बीच में एक बार इस गुड़िया ने कहा - "दीदी! हम भी पानी भरें?" तो उसने जवाब दिया- "तुम अगर ठीक से पढ़ोगी, तो कभी पानी भरने-बर्तन माँजने का काम नहीं करना पड़ेगा।"
छोटी बोली- "लेकिन हम तुम्हारी मदद का काम करके भी तो पढ़ सकते हैं? तुम भी तो स्कूल जाती हो"। बड़ी बहन का प्रयास और छोटी की सीखने की ललक, साथ ही हाथ बँटाने का उत्साह…
रोशनी बेहद कम थी उस घर में, मगर मुझे लगा कि चारों ओर उजाला फैल गया है और यहीं पर मुझे लगा आज बालरूप में मुझे देवी ने दर्शन दिए।

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अब लगा तो कह दिया।
ऐसी बहक और सनक भरी बातें मेरी आदत में शुमार हैं, माफ़ कीजिएगा अगर आपका क़ीमती वक़्त बर्बाद किया या आपको उद्विग्न किया हो। इसलिए भी कहा कि जो पढ़े-सुने उस पर भी देवी की कृपा हो और उसे सद्-बुद्धि भी मिले जिससे कम से कम वह एक कन्या को शिक्षा दिलाने में सहायक सिद्ध हो। हम में से कोई एक भी अगर अपने ख़ाली वक़्त या धन का उपयोग करके किसी कम साधन-संपन्न एक भी बालिका की शिक्षा में सहायक हो पाए तो शायद यह भी देवी की उपासना ही हो! कम साधन संपन्न ही क्यों- मेरा तो मानना है कि हिन्दुस्तान में किसी भी बालिका को शिक्षा दिलाना या उसमें सहायता करना, यहाँ तक कि अगर आप किसी को छात्रवृत्ति के बारे में बता दें या उसको किसी फ़ॉर्म के जमा करने में सहायक हो सकें, तो यह भी पूजा के समान ही है।
आपको नव-"शोभन"-संवत्सर की बधाई!

Monday, March 15, 2010

ग्रीष्म का स्वागत


ग्रीष्म के स्वागत में ककड़ियाँ हाज़िर हो चुकीं कब से - लैला की उँगलियाँ-मजनूँ की पसलियाँ। मगर फ़िलहाल ज़ोर पर हैं चैत्र नवरात्र की तैयारियाँ।
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नवरात्र की तैयारियाँ और देवी दर्शन

दिनांक 16 मार्च को चैत्र प्रतिपदा के अवसर पर कलशस्थापन के साथ ही नवरात्रिपूजन प्रारंभ होगा।
बाज़ार अटे पड़े हैं पूजा के सामानों से। चुनरी, नारियल, वस्त्र, मेवा, सिंहासन, कलावा, धूप-अगरबत्ती आदि।
फूल-मालाएँ वैसे तो रोज़ आने वाली वस्तुएँ हैं, मगर आजकल इनकी मात्रा और खेप बढ़ी हुई है।
नवदुर्गा के विभिन्न स्वरूपों के चित्र, विभिन्न फ़्रेमों और आकारों में उपलब्ध हैं। ये भी "कमोडिटी" ही तो हैं व्यापार में। मोल-तोल हो रहा है - आकार, फ़्रेम, आकर्षकता और विक्रेता की क्षमता और साख के अनुसार।
जनरल स्टोर वाले भी अवसर को भुनाने में लगे हैं, या शायद ग्राहक की सेवा में, द्वार पर ही सभी साधन ला देने को आतुर। रविवार के दिन साप्ताहिक बन्दी के बावज़ूद बाज़ारों में ख़ासी गहमा-गहमी थी।
रविवार को इलाहाबाद के चौक से लिए गए यह दृश्य प्रस्तुत हैं जिनमें 1857 के शहीदों की स्मारक-पट्टिका का सदुपयोग हो रहा है सड़क को घेरते अतिक्रमण के आधार के रूप में बने स्टॉल पर और पूजन सामग्री टिकाने के लिए।
यह पूर्वी उत्तर-प्रदेश के किसी भी नगर के लिए आम दृश्य हो सकता है, मगर यहाँ प्रस्तुत इसलिए किया मैंने क्योंकि मैंने नवरात्र के पूर्व विन्ध्याचल की अपनी यात्रा के दौरान देवी के रूप को साक्षात् देखा।
मैंने एक चित्र भी लिया, जो अगली पोस्ट में आपको प्रस्तुत करूँगा, यथासंभव आज रात्रि को ही या कल। देखिए मोबाइल कैमरे से लिए गए इस चित्र में आप को देवी दिखती हैं या नहीं, यह तो आप स्वयं ही जान पाएँगे।

Friday, February 26, 2010

मौन


बचपन में सुना था कि-
"मौनम् स्वीकृतिलक्षणम्"
अर्थात् मौन को सहमति ही समझना चाहिए। यह ज्ञान अब पुराना पड़ गया।
अब मैं रोज़ कार्यालय में लगी इस सुभाषित पट्टिका को देखकर सोच में पड़ जाता हूँ। लगता है संदर्भ अलग रहा होगा बाबा बेन जॉनसन का, इस उवाच में।
एक वरिष्ठ ने समझाया भी कि-
"जहाँ कोई सुनने को तैयार ही न हो, पूर्वाग्रह से ग्रस्त हो, वहाँ कुछ बोलने से भी क्या और न बोलने से भी क्या? सिवाय ऊर्जा के अपव्यय के!"
अब और सोच में पड़े हम। यानी जिन्हें बोलने का शौक़ है, वो ऊर्जा का अपव्यय करते हैं।
यानी ब्लॉगिये भी। बल्कि ब्लॉगिये तो और ज़्यादा - क्योंकि एक तो कम्पूटर बाबा जो ऊर्जा खाते हैं वो एक्स्ट्रा हुई।
दूसरे स्वयं भी सिर्फ़ बोलने से ज़्यादा ऊर्जा खर्च करते हैं हाथों को हिलाने पर, की-बोर्ड, माउस आदि पर।
तीसरे सोचते भी हैं - सोचने में भी काफ़ी ऊर्जा व्यर्थ नष्ट करते हैं। अब बोलने के लिए सोचना थोड़े ही पड़ता है। अगर ब्लॉगियाने के बदले बोल कर काम चला लेते तो कितनी ऊर्जा बचती!
ऊर्जा के ई संकट कइसे कटै? यानी ब्लॉगिए ऊर्जा की कमी के, यानी उद्योगों के, यानी सेंसेक्स के अउर साथै पर्यावरण के, सबके दुश्मन निकले।
उधर अजय झा जी लिखते हैं - "सोचता हूँ ब्लॉगिंग पर न लिखूँ"
यानी लिख नहीं रहे, मगर सोच तब भी रहे हैं। सोचने से बाज़ नहीं आएँगे।
अब अभिषेक बच्चन जी अगर काग़ज़ बचाने पे बिंगुआ सकते हैं तो हम क्या एनर्जी पर नहीं?
फिर जो ज़्यादा ऊर्जा खर्च करेगा वो ज़्यादा खाएगा भी, वर्ना ऊर्जा की कमी से मर नहीं जाएगा?
फिर अगर ब्लॉगियाने में अनियमित हुए तो जब-जब नहीं ब्लॉगियाए तब-तब ऊर्जा बची, यानी मुटाए। सो अच्छे ब्लॉगिए का स्थूलकाय, विशालकाय होना तय पाया गया।
साथ ही यह भी तय पाया गया कि ब्लॉगिए अन्तर्राष्ट्रीय खाद्यान्न संकट के प्रमुख और मूलभूत कारणों में से एक हैं। यानी कुल मानवता के ही दुश्मन हैं का ई ब्लॉगिए?
हैं क्या, हई हैं।
औ ई जो हम ब्लॉगिया गए हैं सो?
ब्लॉगिए इसके दुश्मन, ब्लॉगिए उसके दुश्मन, मानवता के, पर्यावरण के, …अबे धत्!
जानौ ब्लॉगिए खुदै दुसरे-दुसरे ब्लॉगियों के ही दुश्मन होते हैं का!
नहीं जी। ई सब आपस में बड़े एक हैं। मार एक दूसरे के चिट्ठे पे टिप्पणियाए पड़े हैं। लगता है हम भी सोचने लगे का?
अमें लगता है भंग ज़्यादा हो गयी…
मीठा खाने का मन कर रहा है।
मौनए रहब ठीक रहा…