जहाँ ख़ुदा की नहीं गली दाल, वहाँ बुद्ध की क्या चलती चाल?
वे थे पूजा के विरुद्ध - इसने उन्हीं को दिया पूज,
उन्हें ईश्वर में था अविश्वास - इसने उन्हीं को कह दिया भगवान,
वे आए थे फैलाने को वैराग्य, मिटाने को सिंगार-पटार - इसने उन्हीं को बना दिया श्रृंगार।
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…सबके अंदर उन्हें डाल, तराश, खराद, निकाल
बना दिया उन्हें बाज़ार में बिकने का सामान।
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शेर की खाल, हिरन की सींग
कला-कारीगरी के नमूनों के साथ - तुम भी हो आसीन,
लोगों की सौंदर्य-प्रियता को देते हुए तस्कीन,
इसीलिए तुमने एक की थी आस्मान – ज़मीन?
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(अंत में – यह ज़िक्र करते हुए कि नाचघर में एक तरफ़ बड़ी सी बुद्ध की मूर्ति शोभायमान है, रंग-बिरंगे जलते-बुझते बल्बों के बीच रंगीली सज्जा में – और दूसरी तरफ़ लाइव-ऑर्केस्ट्रा के जाज़ पर जोड़े थिरकना शुरू कर चुके हैं…)
"मद्यं शरणं गच्छामि,
मांसं शरणं गच्छामि,
डांसं शरणं गच्छामि"
मांसं शरणं गच्छामि,
डांसं शरणं गच्छामि"
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इसी तरह एक अन्य पृष्ठ पर उनका फ़ुटनोट देखा -
"यह कविता और गीत – आकाशवाणी केन्द्र में इस दिन फीतांकित किए गए"
और मैं चौंका – टेप-रिकार्ड किए जाने का सार्थक सशक्त अनुवाद –“फीतांकन”! वाह!!
मैंने अब तक नहीं देखा कहीं भी यह प्रयोग।
मेरी अज्ञानता हो सकती है इसमें, मगर यही बातें तो एक सामान्य कवि को विशिष्ट बनाती हैं।
क्या ब्लॉगरी भी सप्रयास ऐसी ही समृद्धि दे नहीं रही हिन्दी को? बिना नारे लगाए भी, मुक्त और स्वच्छ्न्द यह हिन्दी आन्दोलन अब तक के सारे आन्दोलनों, सारे ***वादों और सारी धाराओं को पीछे छोड़ देगा, इसमें मुझे ज़रा भी संदेह नहीं।
मेरी अज्ञानता हो सकती है इसमें, मगर यही बातें तो एक सामान्य कवि को विशिष्ट बनाती हैं।
क्या ब्लॉगरी भी सप्रयास ऐसी ही समृद्धि दे नहीं रही हिन्दी को? बिना नारे लगाए भी, मुक्त और स्वच्छ्न्द यह हिन्दी आन्दोलन अब तक के सारे आन्दोलनों, सारे ***वादों और सारी धाराओं को पीछे छोड़ देगा, इसमें मुझे ज़रा भी संदेह नहीं।
और मुझे समझ में आ गया कि पुस्तक खरीदनी पड़ेगी - जबकि कविता पढ़ने को मैं अच्छी आदत नहीं समझता। वो भी ख़रीद कर–प्रवीण पाण्डेय के शब्दों में कहूँ तो - “शिव-शिव, हर-हर!”
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मैंने पहले भी बहुत कविताएँ नहीं पढ़ी थीं उनकी, और विशेष रुझान भी नहीं था। इसी से उनका गद्य लेखन तो पढ़ा गया – बचपन में, जब समय ख़ूब रहता था मगर कविताएँ – उफ़्! कविता पढ़ना मुझे उबाऊ काम लगता था, और लगता है।कविता सुनना अच्छा लगता था, मगर कुछ ख़ास तरह की, और गेय।
बाद में प्रसाद जी की कविताएँ अच्छी लगीं, निराला की भी। पन्त और महादेवी जी की कविताओं के प्रति वैसा रुझान कभी उत्पन्न नहीं हुआ। महादेवी जी का गद्य भाता है। फिर बिहारी, गुलज़ार, रसखान जमे। फिर मैं समझ पाया कि मेरी पसन्द छोटी, उक्ति-वैचित्र्य से भरपूर और व्यंग्य या तंज़ से भरपूर रचनाओं के प्रति है। आनन्द और दिल तक पहुँचना ज़्यादा ज़रूरी है मेरी पसन्द के लिए।
काका ‘हाथरसी’ जमते थे। उनकी कविताएँ याद करनी पड़ीं, क्योंकि पाँच साल की उम्र में ही उनका रोल अदा करना पड़ा था मुझे, स्टेज पर। वहीं से स्टेज की सवारी शुरू हुई थी, जो अभी जारी है।
