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Wednesday, September 1, 2010

देव आनन्द :रूमान में जिया एक ख़्वाब

देव साहब के जन्म माह  - सितम्बर में - उनका जन्मदिन तो हालाँकि 26 सितम्बर को आएगा जब वे 87 वर्ष पूरे करेंगे, मगर मैं अपनी शुभकामनाएँ देव आनन्द साहब को इस पूरे महीने देते रहने के लिए, आज श्रीकृष्ण जन्माष्टमी के अवसर पर ही यह पोस्ट प्रेषित कर रहा हूँ, सादर। इस सदाबहार नौजवान के लिए महीना भी कम है शायद………
देव आनन्द के नाम से ही रूमानी हो जाने की शुरूआत हो जाती है। जिन्होंने उन्हें देखा - जवानी* में,  वो मानेंगे कि देव साहब का स्क्रीन पर आना एक ताज़ा हवा के झोंके का आना होता था - जिसमें मदहोश कर देने वाली ख़ुश्बू और ताज़ा ओस जैसी मासूमियत भरी ताज़गी होती थी।

वो जिस रूमान की सृष्टि करते थे - उसे महसूसा और जिया जा सकता था - कम से कम ख़ाबों में तो ज़रूर हर कोई जीता था उसे। उनकी फ़िल्में देखना अपने आप में एक हिल स्टेशन की सैर जैसी ठण्डक देता था - और ताज़ा-दम कर देता था कि आ ज़िन्दगी - तुझसे थोड़ा और प्यार करें - जैसी भी है - अच्छी है और बेहद प्यारी है तू !

शायद इसीलिए देव साहब की आत्मकथा का शीर्षक भी 'रोमान्सिंग विद् लाइफ़' है। वाकई ये शख़्सियत एक जीता - जागता ख़्वाब ही है अपने आप में - जो हमेशा रूमान में ही जिया और रूमान ही बुनता रहा।
देव साहब का प्रथम निर्देशन

एक फ़िल्मकार के तौर पर देव साहब की सोच हमेशा वक़्त से बीस-पच्चीस साल आगे ही रही। जब उन्होंने "देस-परदेस" बनाई तो जो समस्या उठाई ग़ैर-कानूनी प्रव्रजन की - वो हमने देश के तौर पर महसूस की तक़रीबन पच्चीस साल बाद। 


जब नशाख़ोरी की समस्या उन्होंने उठाई - "हरे रामा हरे कृष्णा" में तो वो उस दौर की समस्या होते हुए भी हमें टकराई पन्द्रह साल बाद और विकराल हुई बीस साल बाद। देव आनन्द ने अहिंसा का सवाल उठा कर फ़िल्म पिटवा ली - "प्रेम-पुजारी" और वह नौबत अब विश्व के सामने खड़ी हुई आकर इक्कीसवीं सदी में - आतंकवादी चुनौती बनकर।

गवर्नमेण्ट कॉलेज लाहौर से अंग्रेज़ी साहित्य का यह स्नातक न केवल अपने दौर के - बल्कि हिन्दी सिने उद्योग के कुछ गिने-चुने सर्वकालीन उच्च शिक्षित और सुसंस्कृत स्टार-कलाकारों में से एक है - और उन उँगलियों पर गिने जा सकने योग्य चन्द स्टारों में से एक - जो जीते जी मिथक बन गए।

देव साहब के बारे में जानकारी विकिपीडिया पर भी उपलब्ध है और ढेरों अन्य ब्लॉगों पर भी, बहुत कुछ दोहराए जाने का डर होते हुए भी उनके बारे में लिखना-बात करना भी ताज़गी देता है - और उनकी नकल उतारना भी।


किशोर-जिनका फ़िल्मी कैरियर देव साहब की नक़ल ही रहा...
कितने हँसमुख और खिलन्दड़ेपन से वे स्वीकार कर लेते हैं अपनी मिमिक्री - कैरिकेचर - सभी कुछ - यही उनका बड़प्पन है।


उनकी शिक्षा और भारत की आज़ादी के समय की नौजवानी से मिली राजनैतिक जागरूकता ने ही शायद उन्हें उकसाया कि वे श्रीमती गान्धी के आपात्काल का विरोध करें - और उन्होंने एक नेशनल पार्टी भी बना डाली थी उन दिनों। 

उस वक़्त जब बड़े-बड़ों की सिट्टी-पिट्टी गुम थी और खुले क्या - छिपे तौर पर भी कोई श्रीमती गान्धी के विरोध में सामने आने की हिम्मत नहीं जुटा पा रहा था - सिर्फ़ किशोरकुमार, आईएसजौहर और शत्रुघ्न सिन्हा के अलावा! 

बाद में तो हाथी के निकल जाने पर बहुत से शेर फिर से गुर्राने-दहाड़ने लगे…

आर0के0नारायण हों या पर्ल एस0 बक, उनकी पसन्द हमेशा उम्दा रही - फ़िल्मकारों में गुरुदत्त से उनकी मित्रता ने न केवल उम्दा फ़िल्में ही दीं बल्कि और भी कई गुल खिलाए।

देव साहब की साहित्य-संगीत की गहरी समझ से ही जुड़ी रहीं उनकी कुछ ख़ास मित्रताएँ - सचिनदेव बर्मन से, राहुलदेवबर्मन से, किशोरकुमार से और साहिर लुध्यानवी से भी। हसरत जयपुरी और शैलेन्द्र से भी उनकी घनिष्ठता रही है।  यह उनकी साहित्य की समझ ही थी जो 'नीरज' के गीतों का रस हम सिने-दर्शकों तक मधुर संगीत-रस में पगा हुआ आता रहा उनकी फ़िल्मों के रास्ते। 

आज भारत के सर्वाधिक उच्च-तकनीक से सुसज्जित रिकार्डिंग स्टूडियोज़ में अग्रणी है "आनन्द रिकॉर्डिंग केन्द्र" जहाँ तकरीबन साढ़े तीन हज़ार से अधिक रिकार्डिंग - विश्वस्तरीय की जा चुकी हैं। यह भी देव साहब का ही एक प्रतिष्ठान है।


देव साहब की इसी बहु-आयामी प्रतिभा ने उन्हें पहले प्रोड्यूसर और फिर निर्माता-निर्देशक भी बनाया। 'गोल्डी' उर्फ़ विजय आनन्द और चेतन आनन्द जैसे भाइयों के साथ-साथ देव साहब ने न केवल नवकेतन बैनर को खड़ा किया बल्कि उसका परचम फ़हराते-लहराते भी रहे।

शेखर कपूर - देव आनंद के भांजे
शायद बहुत से लोग यह जानते न हों - या भूल गए हों - कि मशहूर दिग्दर्शक शेखर कपूर (बैंडिट क्वीन फ़ेम) उनके भान्जे हैं - श्रीमती शील-कान्ता कपूर के सुपुत्र। 

उनकी इन्हीं बहन के दोनों दामाद (शेखर कपूर जी के दोनों बहनोई) भी मशहूर फ़िल्मी कलाकार रहे हैं - नवीन निश्चल और परीक्षित साहनी (स्व० बलराज साहनी के सुपुत्र - अजय/परीक्षित साहनी)

देव साहब की ज़िन्दगी में 1948 - पहली हिट फ़िल्म 'ज़िद्दी', 1949 - जब उन्होंने नवकेतन बैनर खड़ा किया, 1952 - जब उन्होंने कल्पना कार्तिक से शादी की, 1956 - जब बेटा सुनील पैदा हुआ और 1958 - जब 'काला पानी' के लिए उन्हें बेस्ट एक्टर का अवार्ड पहली बार मिला - ख़ास रहे।


नवकेतन का प्रथम रंगीन चलचित्र
इसके बाद 1971 में उनकी निर्देशित पहली बड़ी हिट फ़िल्म आई - 'हरे रामा हरे कृष्णा' और 1978 में निर्देशन की आख़िरी बड़ी हिट (अब तक) रही 'देस-परदेस'। 'प्रेम पुजारी' उनका पहला निर्देशन प्रयास थी जो फ़्लॉप रही थी - मगर इसके गीत-संगीत की धमक आज भी है।

'गाइड' देव साहब की 1965 में रिलीज़ पहली रंगीन फ़िल्म थी और आज भी सजग सिने-प्रेमियों की पसंदीदा सूची में ऊपर ही गिनी जाती है - राज कपूर की 'मेरा नाम जोकर' की तरह। 'गाइड' के लिए उन्हें दोबारा फ़िल्मफ़ेयर का राष्ट्रीय पुरस्कार मिला 1966 में। 

2000 में उन्हें श्रीमती हिलेरी क्लिंटन, तत्कालीन अमेरिकी राष्ट्रपति की पत्नी (अतएव यूएस की प्रथम महिला नागरिक) ने अमेरिका में सम्मानित किया, 2001 में 'पद्मभूषण' उपाधि प्रदान की गयी और इसके बाद उन्हें दादासाहेब फाल्के अवार्ड से भारत सरकार द्वारा सम्मानित किया गया। 

पुरस्कार  और उपाधि का मोहताज नहीं ये दीवाना - जिसके जैसा जीवन जिस किसी को भी मिल जाए - तो उसके लिए तो अपने आप में कुदरत का इनाम ही है ये जिंदगी समझो!

देव आनन्द साहब की आत्मकथा "रोमान्सिंग विद लाइफ़" के विमोचन की तस्वीरें
2007 के सितम्बर में उनकी पेंग्विन प्रकाशित आत्मकथा "रोमान्सिंग विद लाइफ़" का विमोचन हुआ - भारत के तत्कालीन (और वर्तमान भी) प्रधानमन्त्री श्री मनमोहन सिंह के साथ जन्मदिन की पार्टी में।

उनकी आत्मकथा का महत्व और ज़िक्र इसलिए भी कि यह एक ईमानदार आत्मकथा है - जिसमें उन्होंने अपने सुरैया और जीनत अमान के प्रति लगाव को बेबाकी से स्वीकार किया है - आत्मश्लाघा से भरा स्व-यशोगान नहीं है यहाँ।
मेरी प्रेम-कहानियाँ!


देव साहब की जोड़ियों में सुरैया से बात शुरू होती है और नूतन, वहीदा रहमान, वैजयन्तीमाला, तनुजा, मुम्ताज़, ज़ीनत अमान, हेमा मालिनी से होती हुई टीना मुनीम तक तो याद रहती है, फिर इसके बाद फ़िल्में हिट न होने से थोड़ा ज़ोर डालना पड़ता है याददाश्त पर। 

उनकी खोजों में जैकी श्रॉफ़ का नाम भी आता है - ज़ीनत अमान, टीना मुनीम (अम्बानी) और तब्बू के अलावा। उनके द्वारा फिल्म-निर्माण के लगभग हर क्षेत्र में नयी प्रतिभाओं को अवसर दिया जता रहा है।


हम नौजवान
श्री देवदत्त पिशोरीमल आनन्द उर्फ़ 'देव आनन्द' अब जब 86 बरस पूरे कर चुके हैं और 87वें वर्ष में हैं जो ऊपर वाले की इनायत से 25 सितम्बर 2010 को पूरा होगा (जन्मतिथि 26 सितम्बर 1923)  तो यह याद आता है कि वे अपने 85वें बरस में यह कह रहे थे कि "मैं नहीं जानता कि मैं इसे (चार्जशीट - देव साहब की निर्माणाधीन नवीनतम फ़िल्म) पूरा कर भी पाऊँगा या नहीं, मगर यह ज़रूर जानता हूँ कि मैं आख़िरी साँस तक इसे पूरा करने की कोशिश ज़रूर करता रहूँगा - काम करता रहूँगा"।

और 87वें बरस में जब वे घोषणा करते हैं अपनी ही 1971 में निर्देशित-अभिनीत हिट 'हरे रामा हरे कृष्णा' का रि-मेक बनाने की, तो कोई शक़ कहाँ बाक़ी रह जाता है उनकी जवानी में! 

अंतिम दो चित्र - 83 और 85 की उम्र में...
जवानी की परिभाषा आखिर और क्या होती है - सिवा हौसले और हिम्मत के, उम्मीदों के? और न मानिए तो ज़रा एक नज़र देखिए बगल के चित्र में - राजेश खन्ना और देवानंद में कौन ज्यादा उम्रदराज़ मालूम देता है?


ये अलग बात है कि जोश और जवानी उसी सिक्के के दूसरे पहलू हैं जिसके एक पहलू को लोग दुस्साहस या बेवकूफ़ी समझते रहे हैं - मगर कला को समर्पित कलाकार तो जुनूनी होता ही है। 

और हाँ, जुनूँ में नफे-नुकसान का होश नहीं होता, क्योंकि होश में ऐसा जोश भी तो नहीं होता…!


भले ही 1978 में बनी देस-परदेस उनकी आख़िरी हिट फ़िल्म मानी जाती हो मगर उनके सारे काम में एक ताज़ा और अनोखी क्रिएटिविटी है - जो कभी-कभी भटकती लगती ज़रूर है - शायद एक और हिट की तलाश में - मगर असल में देव साहब इज़ स्टिल रोमान्सिंग विद लाइफ़ - और शायद लार्जर दैन लाइफ़ कैनवास पर…
रोमांसिंग विद लाइफ़... शुभ जन्मदिन, जन्म महीना देव साहब!

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* {उस जवानी में जो बाक़ायदा क़ायम थी तब तक -जब तक कि उनकी हीरोइनें नानी - दादी बन गयी थीं और चाहने वालियाँ भी - और जो तब तक क़ायम रही जब तक कि उनके बाद की तीसरी पीढ़ी के नायक (अमिताभ बच्चन सहित) अपनी बढ़ती उम्र की दुहाई देकर नौजवानी के रोल करने से गुरेज़ करने लगे - जो तब तक भी क़ायम रही जब तक कि उनकी अदाओं को कॉमेडी का सामान नहीं बना लिया गया और वह भी देव साहब ने बिना किसी गुरेज़ के स्वीकार कर लिया - और जो ज़ेहनी तौर पर अभी भी अपने पूरे जवान जोश के साथ क़ायम है}
पुनश्च: ज़रा ऊपर लिखे नोट को देवसाहब की आवाज़ और अन्दाज़ में सुनने की कोशिश कीजिए…अलग तरह का मज़ा आएगा!

Wednesday, June 23, 2010

नए ब्लॉग अनुभव दर्ज करने की तैयारी

"इक मीर था - फिर इंशा थे - फिर फ़ाज़ली निदा; फिर फ़ाकामस्ती की हमीं ने ओढ़ ली रिदा"
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ऐसा नहीं कि मैंने नए ब्लॉग कम पढ़े
ऐसा भी नहीं है कि पुरानों से कट गया
कीचड़ की सल्तनत का देख राज्याभिषेक
मन ही तो है - कुछ दिन के लिए दूर हट गया

देखा कि लोग आते हैं बेकार बात पर
अख़बार जैसी पोस्ट पर - या ज़ात-पाँत पर
चिट्ठे का नाम लिख दो तो आ जाएँ टीपने
वर्ना लगेंगे अच्छी भली पोस्ट लीपने

कुछ लोग आए सोच के अहसान करेंगे
कुछ आए कि हम आगे उनका ध्यान करेंगे
देखा तो बयालीस लोग टीप चुके थे
हम सोच के बोझे से थके और झुके थे

क्या हो गया ! हमने तो बस अनुभव किए थे दर्ज
लगता है टिप्पणी भी है इक "वोट" जैसा मर्ज़
लगने लगा कि कैसे चापलूसी करें हम
वर्ना सज़ा भुगतने का लाएँ कहीं से दम

फिर यूँ हुआ कि हमने हौसला नहीं खोया
झूठे तकल्लुफ़ात का रोना नहीं रोया
तय पाया कि फिर दर्ज ख़यालात करेंगे
जो भी हो - हौसले से अपनी बात कहेंगे

तो अब यही सोचा है कि अपने ये तज्रुबात
बाँटेंगे, मगर बाँटेंगे अपने ही ख़यालात
जो सच है वही सच, जो कबूतर वो कबूतर
गिरगिट है तो गिरगिट, जो फ़टीचर तो फ़टीचर

जाएगी झूठी दोस्ती तो जाय आज ही
इस डर का हमें करना पड़ेगा इलाज ही
कुछ भी न रहे - बाक़ी है ईमान तो क्या ग़म
दुनिया से क्या? ख़ुद अपनी नज़र में तो जँचें हम
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यानी इस फ़ैसले के बाद अब चला जाय नए ब्लॉग अनुभव लिपिबद्ध करने। वक़्त लगेगा थोड़ा, मेहनत भी।
अब देखें कौन कहता है - 'दाग़' अच्छे हैं।
"धुलाई का पक्का वादा, सफ़ाई कम, क़ीमत ज़्यादा"

Thursday, May 13, 2010

अभिव्यक्ति-2

अभिव्यक्ति को अगर अभि-व्यक्ति लिखा जाए तो इसका अर्थ भिन्न हो जाएगा। ये अलग बात है कि प्रचलन में न होने से वह दूसरा अर्थ न लेकर लोग रूढ़ार्थ से ही काम चला लेंगे। अभि=सीधा, व्यक्ति=आदमी यानी "-" से जुड़ा होने पर यह भाव-वाचक संज्ञा से विशेषण में बदल जाएगा क्या? तकनीकी दृष्टि से - "हाँ"।
रूढ़ार्थ का कमाल देखिए - अक्सर ब्लॉग पर टिप्पणीकर्ता, जो तेज़ी में रहते हैं, कई जगह और भी जाना है उन्हें; "उम्दा" "अति सुन्दर" "नाइस" "ग़ज़ब!" से काम चला लेते हैं।
अब 'ग़ज़ब' का अर्थ देखिए - इसका अर्थ हर कोश में दैवी आपदा, क्रोध, कोप, रोष, ग़ुस्सा, आपत्ति, आफ़त, अंधेर, विपत्ति, ज़ुल्म वगैरह मिलेगा। विशेषण के अर्थ में प्रयुक्त होने पर इसका प्राथमिक अर्थ होता है -"बहुत" या "बहुत अधिक" और द्वितीयक अर्थ होता है -"विलक्षण"। मगर इसका रूढ़ार्थ क्या है? "विलक्षण" या "विस्मयकारी" या "चमत्कारी" और आप कितना भी ढूँढें, इस अर्थ के अलावा इस शब्द का प्रयोग लगभग नगण्य मिलता है।
ऐसा ही बहुत से अन्य भाषाई शब्दों को जब कोई भाषा अंगीकार करती है, तो एक ख़ास रूढ़ार्थ को ध्यान में रखकर। फिर उस भाषा में उस शब्द का वही एक अर्थ हो जाता है। जैसे 'स्कूल' का हिन्दी में एक ही अर्थ है - विद्यालय।
'स्विच' का भी हिन्दी में एक ही अर्थ है, और भी कई शब्द हैं ऐसे।
कई बार ऐसा भी होता है कि शब्द एक भाषा से दूसरी में गया और उसके साथ एक ऐसा अर्थ जुड़ गया जो उस शब्द का मौलिक अर्थ कहीं से था ही नहीं, पर अब नई भाषा में उस शब्द का वही अर्थ हो गया। जैसे 'धारीदार' कपड़ा ख़रीदते समय उसे "लाइनिंग"दार कहा जाना, निहायत ग़लत मगर स्वीकृति की हद तक प्रचलित प्रयोग है। "लाइनिंग" का अर्थ अस्तर होता या फिर तनिक उच्चारण भेद से "आकाशीय बिजली", तो संभाव्य था। मगर नहीं, हम तो धारीदार के लिए ही इस्तेमाल करेंगे।
"बियरिंग" जब हिन्दी में आया तो बहुत समय तक इसका एक ही अर्थ था जो विशेषण "बियरिंग" का अर्थ था और उसे हम "बैरंग" कहते और पत्रों से जोड़ते थे जिनका पूरा डाक-ख़र्च प्रेषक द्वारा अदा न किया गया हो। अब डाकसेवा की लोकप्रियता और सेवा - दोनों के अभूतपूर्व ह्रास के कारण यह अर्थ खो गया है। इस बीच ही आटोमोबाइल व अन्य मशीनों, पंखा, ट्रैक्टर आदि की उपलब्धता बढ़ी और दाम भी अधिक लोगों की पहुँच में आ गए - तो "बियरिंग" के संज्ञा रूप से लोग परिचित हुए और अब रूढ़ार्थ यही है। ऐसा ही 'ट्रैक्टर' और 'ग्लास' के साथ भी है और इनके तो रूढ़ार्थ ही प्रचलन में हैं, मूल अंग्रेज़ी में भी।

Monday, May 10, 2010

मेरे नए ब्लॉग अनुभव

कुल मिला कर बीते दिनों को याद करके हँसी आ रही है।
बीते दिनों को याद करके कोई हँसता है, कोई रोता है। जिसे लगता है कि “कितनी बेवकूफ़ी की बीते दिनों!” - वो हँसता है। जिसे लगता है कि बेवकूफ़ी बीते दिनों नहीं हुई, अब हो रही है, वो नहीं हँसता।
HM CHARLIE Sसबसे पहले तो हँसी आती है अपनी समझ पे - बज़ देखी, कमेण्ट किया या आगे बढ़े और उस कमेण्ट के बाद सब बज़ को म्यूट कर देता था मैं। मज़े की बात ये है कि अब भी मैं बज़ से आगे बढ़ते ही म्यूट कर देता हूँ, क्योंकि मुझे पता नहीं कि और क्या करना चाहिए बज़ का। ज्ञानदत्त जी ने अभी पिछले हफ़्ते पूछा कि मैंने “अपने ब्लॉग बज़ से तो जोड़े हैं न?” तो कबूलना पड़ा कि “नहीं”। पता ही नहीं था कि कैसे जोड़ूँ। अब तो कुछ सीखा और कर लिया पिछले रविवार को।
फिर एक पुरानी बज़ जिसमें मैंने अपने अनुभव इसी तरह दर्ज किए थे, उसको पा गया बज़ को टटोलने में। बहुत से कमेण्ट थे – सलाहें थीं कि इसे पोस्ट बना देना चाहिए। मैं बज़ म्यूट करके मस्त था! कुछ पता नहीं था कि कितनी बड़ी अभद्रता कर रहा था – अजाने में। सो अब यह पोस्ट पर ही दर्ज कर रहा हूँ और लिंक सहित (देखिए मैं सलाह पर अमल करता हूँ – अच्छे बच्चों की तरह!)।
फ़ॉलो करने वालों के ब्लॉग पर जाना आसान होता है। यही सोच कर फ़ॉलो करने वाला विजेट लगा लिया अपने ब्लॉग पर, ऊपर ही। नतीजा – प्रवीण त्रिवेदी जी, माणिक का माणिकनामा, पद्मसिंह जी का पद्मावलि और (पद्मसिंह जी का साथ पहले ही कुछ प्रगाढ़ लगता है, शुरूआत के साथी हैं न!) दिलीप जी का ब्लॉग तथा प्रणव के अमित्राघात पर जाना आसान हो गया मेरे लिए। कुछ ब्लॉग हटाए भी - जिन पर मैं कुछ पसन्द का नहीं पा रहा था, और जिन पर नई सामग्री नहीं थी। गूगल रीडर पर मुझे आसान नहीं लगा मनचाहे ब्लॉग पर जाना।
आराधना और स्तुति पाण्डेय दोनों ब्लॉग पर भी सक्रिय हैं और बज़ पर भी। अजीब सी आदत होती है लड़कियों की - लड़कियाँ चाहती हैं कि उन्हें कोई छेड़े - तभी तो पहले बताती हैं कि उन्हें चिढ़ किस बात से है, फिर चिढ़ाई जाने पर ख़ुश होती हैं। ये बात मैं अपने बचपन से नोट कर रहा हूँ, ज़्यादातर दीदियाँ तब भी ऐसी ही होती थीं, अभी भी मेरी बेटी पहले अपने भाई से ख़ुद ही कुछ शेयर करेगी, फिर उसी पर घमासान छिड़ेगा।आराधना का ब्लॉग, भानुमती का पिटारा - स्तुति पाण्डेय, ई-गुरू राजीव उर्फ़ आरएनडी, प्रवीण त्रिवेदी मास्साब के ब्लॉग, शेफ़ाली पाण्डे का कुमाऊँनी चेली इन सब पर मैं नियमित जाता रहता हूँ, अक्सर अच्छा पढ़ने को मिल जाता है यहाँ। मन हुआ तो टिप्पणी भी करी – न हुआ तो न करी।
और ब्लॉगर जो नज़र में आए, उनमें हैं अदा जी जिनके ग़ुरूर, अदा और हुनर का परस्पर संबंध अन्योन्याश्रित है, मगर मेरी नज़र में तो उनके लाडले मयंक की रेखाएँ बसी हैं - कृष्ण! प्रकट ही हो गए आप तो मयंक की रेखाओं में! उनकी काव्यमञ्जूषा भी खोल के देख आता हूँ कभी-कभी। पिछले दिनों कुछ खिन्न सी थीं, ब्लॉगजगत की किन्हीं घटनाओं से; मुझे अच्छा लगा कि मैं पूर्णकालिक ब्लॉगिया नहीं हूँ – मेरे पास अपने सरदर्द पहले ही कम नहीं हैं। अब यशोधरा पर एक अच्छी रचना लाई हैं आज मदर्स डे पर।
अरविन्द मिश्रा का क्वचिदन्यतोऽपि, अमित्राघात, ज्ञानदत्त पाण्डेय जी की मानसिक हलचल – मेरी हलचल उन्होंने इस बीच शुरू किया और स्थगित भी कर दिया, प्रवीण पाण्डेय और उनका ब्लॉग प्रवीण और ज्ञान पाण्डेय, शिवकुमार मिश्रा और ज्ञानदत्त पाण्डेय का ब्लॉग परिष्कृत रुचि की माँग को पूरा करते हैं और हिन्दी ब्लॉग में प्रवीण पाण्डेय जैसे और ब्लॉगियों की ज़रूरत है, उसे समृद्ध बनाने और विश्वस्तर का बनाने के लिए। और भी ऐसे ब्लॉगिये हैं, मगर प्रवीण की तरह अपने स्तर का निर्वहन करते रह पाने में देखें कब तक ये सब सक्षम रहते हैं। शरद कोकास भी गुणवत्ता का उच्च स्तर बनाए रखते हैं, और संवाद में भी रहते हैं। फुरसतिया के बारे में भी यही राय है कि वह स्तरीय लेखन करते हैं, और जब ठेलुअई करते हैं तो वह भी स्तरीय।
रानी विशाल का काव्यतरंग, माणिक का माणिकनामा बढ़िया हैं। रतन सिंह शेखावत का ज्ञान-दर्पण बहु्त काम का ब्लॉग है, हिन्दी तक सीमित ब्लॉगरों के लिए। प्रियदर्शिनी तिवारी शौकिया लिखती हैं, अनियमित हैं मगर अच्छा लिखती हैं। जिन्न्श वाला लेख तो कमाल था। ताऊ का अड्डा भी बड़ा रोचक है और अपनी रोचकता भी बनाए हुए है और सरोकार भी। प्रणाम इसी बात पर। बस ये नहीं जान पाता कि ये चिम्पैंज़ी की खाल का बुर्क़ा ओढ़े रहने वाला ताऊ है कौन?
इयत्ता, चोखेर बाली – वन्दना पाण्डेय, अन्जना का ब्लॉग - पॉवर,  व्योम के पार-अल्पना वर्मा, वन्दना अवस्थी 'दुबे' की अपनी बात और किस्सा कहानी इन सब पर पढ़ने को अच्छी सामग्री मिलती रहती है। एक चर्चा मंच है जहाँ कृति देव से यूनिकोड में और उल्टा परिवर्तन संभव है, वहीं दाएँ हाशिए में इसका लिंक है। मैं वन्दना गुप्ता जी के संदर्भ से पहुँचा था यहाँ। वन्दना जी के ज़ख़्म जो फूलों ने दिये,  ज़िन्दगी……एक ख़ामोश सफ़र और एक प्रयास तीनों ही अच्छी रचनाओं के ठिकाने हैं, मगर उनकी अपनी ही रचनाएँ क्रॉस-पोस्ट भी होती हैं इन पर।
बहुत रंगीन से कई लेबल लगे होते हैं जहाँ- वहाँ से मैं जल्दी ही भाग लेता हूँ। ईमानदारी से स्वीकार करता हूँ मुझे सज्जा करनी नहीं आती – मेरे ब्लॉगों की थीम भी ज्ञानदत्त जी ने सहेज दी है – सो लगी है।
वास्तव में यह सहजता, मृदुता और नए ब्लॉगियों को प्रोत्साहित करने का बड़प्पन ही “उड़नतश्तरी” tn64समीर लाल जी और ज्ञानदत्त जी को वह दर्जा दिलाए हुए है जिस तक पहुँचने के लिए सिर्फ़ एक अच्छा ब्लॉगिया  ही नहीं, और भी बहुत कुछ होना पड़ता है। उड़नतश्तरी आप के यहाँ से गुज़रेगी सर्रर्रर्रर्रर्र और टिप्पणी कर के आप को दे जाएगी ऑक्सीजन आपके ब्लॉग को जिलाए रखने के लिए – जब तक आप यह प्राणवायु देना स्वयं न सीख लें –या जब तक उड़नतश्तरी दुबारा सर्राटा न भरे…!
अमित्राघात पर नई रचना बहुत ख़तरनाक हालात को बयाँ करता हुआ सशक्त ताना है, समाज की महिलाओं के प्रति संवेदनहीनता और दोहरे मापदण्डों के प्रति।
पंकज उपाध्याय ने ग़ज़ब ढा दिया है अपनी नई पोस्ट में- मेरे विचार मेरी कविताएँ पर। कभी गुमसुम, कभी उदास और मासूम, कभी रंगीला-छ्बीला ये लड़का मेरी नज़र में लड़कियों के लिए एक सॉफ़्ट टारगेट है – एलिजिबुल कुँआरा और जैसा है वैसा होने के नाते। अरे पण्डितो! और कुँआरी कन्याओ! मौसियो! चचाओ! पकड़ो – जाने न पाए!
पीडी - मेरी छोटी सी दुनिया और कॉमिक्स, ललित शर्मा ललितडॉटकॉम, अजित वडनेरकर का शब्दों का सफ़र, सुख़नसाज़, सुख़नवर2सुख़नवर, संजीत त्रिपाठी का ब्लॉग सब बहुत अच्छे लगे। पीडी यानी प्रशान्त प्रियदर्शी की लेखनी में तो दम है ही, उन्होंने बड़े-बड़ों को बच्चा बना दिया, और यह कहने में मुझे कोई संकोच नहीं कि मेरी कॉमिक्स पढ़ने की प्यास अभी भी अधूरी ही है।
सिद्धार्थ शंकर त्रिपाठी जी, अरुणेश जी और झनकार के ब्लॉग तथा राजे शा का हँसना मना है,  भी अच्छे लगे। संजीव तिवारी जी की पत्रकारिता स्तरीय है। सुमन “nice” जी को कौन भूल सकता है? बहुत-बहुत धन्यवाद उनके प्रोत्साहन के लिए। इसके साथ ही एक आनन्द का ब्लॉग देखा था जो संस्कृत में था, शायद इन सबको फ़ॉलो करना भूल गया या शायद लिंक हट गया - तभी इस समय लिंक नहीं मिल रहा। बाद में ढूँढ कर लगाऊँगा।
राकेश कौशिक जी का हृदय-पुष्प, पूनम जी का झरोखा, शारदा अरोरा जी का गीत-ग़ज़ल, ज़िन्दगी के रंग  सब बहुत अच्छे लगे मुझे। शारदा जी को चेतावनी दे आया था कि उनकी कोई रचना –या यों कहें कि उनका “आइडिया” चुराऊँगा किसी दिन, अभी चुराना शेष है।
शरद कोकास का ब्लॉग एक ऐसा ब्लॉग है जहाँ जाकर कभी निराश नहीं लौटना पड़ा। ज़ाहिर है कि ये भी न केवल अच्छे रचनाकार और कवि हैं, बल्कि साथ ही अच्छी चयन की समझ भी रखते हैं। अनूप शुक्ल ही फुरसतिया हैं ये जानने में देर लगी,जब से मैंने प्रोफ़ाइल देखना शुरू किया तब जाना। फ़ोटो लगाते हैं ब्लॉग पर, मगर प्रोफ़ाइल पर नहीं–शायद फ़ुर्सत न मिली हो! :)
ग़ज़ल के बहाने - श्याम सखा ‘श्याम’ जी के ब्लॉग पर जाना सुखद रहा, श्रद्धा जैन की भीगी ग़ज़ल तो ख़ैर भिगोती ही है। नीरज गोस्वामी का ब्लॉग, कुमार ज़ाहिद का ब्लॉग, गौतम राजरिशी का “पाल ले इक रोग नादाँ”;  पंकज सुबीर की कुछ प्रेम कथाएँ, सर्वत इण्डिया, वीनस केसरी और उनका ब्लॉग आते हुए लोग, पद्म सिंह, अर्श, मुफ़्लिस और उनका तर्ज़-ए-बयाँ, शाहिद मिर्ज़ा ‘शाहिद’ के जज़्बात ये सब ग़ज़ल से जुड़े अच्छे ब्लॉग हैं, मुझे पसन्द हैं। सतपाल ख़याल बड़ी मेहनत से काम कर रहे हैं आज की गज़ल पर।
जिन्हें मैं लगातार गूगल बज़ पर ही पढ़ता रहा हूँ (कभी-कभी ब्लॉग पर भी जाना होता है) वे हैं दिनेशराय द्विवेदी जी-बज़ पर और अजय झा जी भी-बज़ पर। द्विवेदी जी का संस्मरणात्मक और वर्णनात्मक लेखन उम्दा और सहज है और विधि के तो विशेषज्ञ वे हैं ही।
अविनाश वाचस्पति जी- नुक्कड़ पर, संगीता पुरी जी का गत्यात्मक ज्योतिष जिन्हें मैं लगातार पढ़ता रहा हूँ ऐसे नियमित और अच्छे ब्लॉग हैं। इन्दु पुरी गोस्वामी जी का ब्लॉग भी बहुत रोचक और प्रेरणास्पद बना रहता है, बाक़ी स्वयं वे “हक़ से माँगो प्रिया गोल्ड” टाइप लगीं। अपनी बात पूरे हक़ और अपनत्व से कहती हैं; कोई बनाव-दुराव-छिपाव नहीं – सीधा-सरल व्यवहार। हरकीरत ‘हीर’ एक अत्यन्त सशक्त हस्ताक्षर हैं कविता के सभी पृष्ठों पर। अनुवाद में भी उनका योगदान है, मैंने अभी देखा नहीं सो कैसे कहूँ उस बारे में?
जो नए जोड़े -
गुलज़ारनामा,  दिव्या का ब्लॉग, निशान्त मिश्रा का ब्लॉग से ज़्यादा मज़ेदार योगदान ट्विटर पर मिलता है मुझे – यू-ट्यूब लिंक के रूप में। अन्य भी कई ब्लॉग और उनके रचनाकारों का ज़िक्र बाक़ी है, जैसे स्वप्निल कुमार “आतिश” का “कोना एक रुबाई का”, चौधरी, अनामिका की सदाएँ, अनिल कुमार “हर्ष” आदि; सुलभ सतरंगी, पारुल मगर अब अगर आज ही सब को लिख सका तो फिर अगली बार क्या लिखूँगा?
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इस पोस्ट में यदि किसी को कुछ आपत्तिजनक लगे तो मुझे क्षमा कर दें। ये मेरी अपनी राय है, बदल भी सकती है और नहीं भी। मगर ये किसी दूसरे की राय नहीं है, अत: ईमानदारी से सारी ज़िम्मेदारी मेरी अपनी है। वैसे भी मेरी अकिंचन राय से किसी को क्या फ़र्क पड़ सकता है?
स्वार्थपरक निजी कारणों को मैं सार्वजनिक किए देता हूँ : मुझे अपने पसन्दीदा ब्लॉग ढूँढने के लिंक एक जगह मिल जाएँ इस उद्देश्य से मैंने लिंक इकट्ठे किए, और राय इसलिए दर्ज की कि बाद में देखूँ और हँस सकूँ – कि इस समय मैं क्या सोचता था! (और इस बारे में बज़ पर मिली सलाहों का ध्यान रखने की पूरी कोशिश भी की है)

Thursday, April 29, 2010

अमिया वाली ग़ज़ल : नवीनतम शे'र



अमिया वाली ग़ज़ल में हालात के मद्देनज़र एक शे'र और जुड़ गया है -
फलने पर   डण्डे   मिलते -  दस्तूर   पुराना  है,
सबकी अपनी अपनी नीयत कहाँ बदलती है!