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Monday, August 9, 2010

हिन्दी फ़िल्मों और समाज का साथ-3 (राज कपूर और चार्ली चैप्लिन से आगे)

हिन्दी फ़िल्मों और समाज का साथ-2 से आगे...

देश की विस्फोटक स्थिति तो आपात्काल से नियन्त्रित की जा सकी पर फ़िल्मों में आपात्काल के हटने के बाद यह स्थिति और भी अनियन्त्रित हो चली। जनता भी अपने चुने हुए विकल्प "जनता" की सरकार की गति देख चुकी थी और वैकल्पिक सरकार के अवयवों से मोहभंग की मनोदशा में आ चुकी थी। {यहाँ मैं अमृतलाल नाहटा की फ़िल्म "किस्सा कुर्सी का कोई चित्र देना चाहता था - जो दुर्भाग्य से मैं ढूँढ नहीं पाया।}

फ़िल्मों के प्रिय विषय राजनेता, राजनीति और माफ़िया का गठबन्धन के इर्द-गिर्द घूमने लगे। आने वाले समय में श्रीमती गान्धी की हत्या के बाद विदेशी जासूसी संस्थाओं, आतंकवादियों के मसाले फ़िल्मों में ख़ूब इस्तेमाल हुए। इसी संदर्भ में आगे चलकर बोफ़ोर्स और विश्वनाथ-प्रताप सिंह के घटनाक्रम से मिलने वाले मुद्दे भुनाने योग्य भी थे और जनता की जिज्ञासा के केन्द्र भी। कथानक में अब ये उसी तरह उलझाए जाने लगे जैसे पिछले दौर में कैबरे, डिस्को और बलात्कार। मानव बमों के संदर्भ भी 1991 की दुर्भाग्यपूर्ण घटना के बाद कई फ़िल्मों में दिखाए गए।

"कर्मा" और "तहलका" इनमें से प्रमुख हिट फ़िल्में रहीं।
"कर्मा" में "डॉक्टर डैंग" तो तहलका में "डौंग";
"कर्मा" में विश्वप्रताप के साथ "क़ैदी" (शोले) तो
"तहलका" में कोर्ट्मार्शल्ड फ़ौजी "धरम सिंह" - यानी
बारह मसाले के एक सौ आठ स्वाद…
तहलका में नसीर, जावेद भी बिकिनी में आ गए

यह हिंसा आधारित दौर थोड़ा लम्बा चला क्योंकि पाश्चात्य प्रभाव और नई मौलिक सोच का अभाव जहाँ एक ओर था, वहीं दूसरी ओर हिंसा के इस दौर में अपनी जेनुइन और नैसर्गिक भागीदारी का हक़ माँगते हुए वह हाजी-मस्तान, वरदाराजन, दाऊद-नुमा माफ़िया अपने पर फ़िल्में बनाने और स्वयं को महिमामण्डित करने का आकांक्षी हो चला जो अभी तक काला-बाज़ार और काला-धन के रास्ते से हिन्दी सिनेमा पर परोक्ष नियन्त्रण रखता था। नायक स्वयं अब प्रतिनायक से आगे जाकर खलनायक ही हो गया, परन्तु महिमामण्डन की बदौलत केन्द्रीय चरित्र बना रहा।

जैसे मुग़ल साम्राज्य के पतन के कारणों में से एक प्रमुख कारण था "अयोग्य उत्तराधिकारियों का होना" या "योग्य उत्तराधिकारियों का न होना" वैसे ही हिन्दी सिनेमा में भी स्टार-पुत्रों का चलन धीरे-धीरे वीभत्स रूप पा चला था। राज कपूर स्वयं भी स्टार-पुत्र कहे जा सकते थे, परन्तु उन्हें स्वयं के श्रम और प्रतिभा के बलबूते अपनी पायदान हासिल हुई थी।

रणधीर और ॠषि को भी लॉञ्च ज़रूर किया गया, मगर उनकी सफलता उनकी अपनी कमाई हुई और छवि स्वयं की गढ़ी हुई थी - सश्रम। अब के दौर में जो लाए जा रहे थे, और जो ला रहे थे - वे दोनों ही प्रोफ़ेशनल वैल्यूज़ के मामले में कहीं नहीं ठहरते थे।
इस भेड़चाल में सनीदेओल और संजय दत्त के अलावा किसी की गाड़ी न दूर तक चली, न देर तक - बावजूद कुछ हिट फ़िल्मों के।

इसी पतनोन्मुख दौर में हताशा से ग्रस्त सिनेमा को तकनालॉजी की उन्नति (जो जनता के लिए वरदान थी) के अभिशाप भी झेलने पड़े - पहले वीसीआर और फिर सीडी/डीवीडी जनित पायरेसी। ऑडियो उद्योग को तो यह पायरेसी लील ही गयी।

हिंसा के रथ पर सवार महानायक भी इस बीच प्रायोजित सफलता प्रचारों के बीच व्यावसायिक असफलता चख चुके थे। अपनी प्रतिभा और चातुर्य से उन्होंने भी कॉमेडी का च्यवनप्राश लेना प्रारम्भ कर दिया और रोल भी थोड़ा बड़ी उम्र के करने लगे - सो उनकी जीवन-अवधि और बढ़ी।

चेहरे और चरित्र : महानायक
समय रहते ही उन्होंने बड़े भाई और पिता के रोल के रूप में केसरी-जीवन लेकर "साठ साल के बूढ़े या साठ साल के जवान?" के प्रश्न को आधार प्रदान किया और बहुतों को आयुर्वेद में आस्था रखने और "बनफूल" के प्रयोग के लिए प्रोत्साहित किया। इस घटनाक्रम की अवश्यम्भावी परिणति थी एक योग्य कलाकार के लिए रिक्त हिन्दी सिने-उद्योग में स्टारडम की गद्दी जो समय रहते शाहरुख़ ख़ान ने लपक ली।
बाज़ीगर "किंग" ख़ान

Wednesday, August 4, 2010

हिन्दी फ़िल्मों और समाज का साथ-2 (राज कपूर और चार्ली चैप्लिन से आगे)

"मेरे देश की धरती…"
अवसर का फ़ायदा उठाने, शहर जाने और 'देस' या 'माटी' को छोड़ने की सोच को हिक़ारत से देखना इस क़दर था कि नायक हमेशा मज़दूर की मशीन पर जीत का हामी होता था और 'माटी' को छोड़ने वाले का चरित्र निभाना प्रेम चोपड़ा सरीखे खल-सहनायक के हिस्से आता था (उपकार)।

मगर ज़माना बदलना शुरू हो चुका था।

समय के साथ किरदार बदले, ज़रूरतों और सहिष्णुता की जगह अवसर-वादिता ने ली और दमित इच्छाओं को साकार करने के लिए नायक का अवसर को भुनाना आम हो चला। पहले राज कपूर अप्रासंगिक हुए और 'मेरा नाम जोकर' की व्यावसायिक असफलता इसकी पहली चेतावनी थी। फिर धीरे से भावुकता और सच्चाई - ईमानदारी जैसी 'वैल्यूज़' ही 'आउट ऑफ़ फ़ैशन' हो चलीं।

वैसे तो परिवर्तन एक सतत प्रक्रिया है और इसीलिए हर पीढ़ी को अपना दौर संक्रमण-काल लगता रहा है, मगर भारत के संदर्भ में यह वास्तव में यह पहला गंभीर संक्रमण काल था। आज़ादी मिले 25 बरस हो चले थे और लोगों ने आज़ादी के बाद की उपलब्धियों का मूल्यांकन अपने तौर पर, अपने संदर्भों से अपनी-अपनी उम्मीदों के हिसाब से करना शुरू कर दिया था।

अभी वो पीढ़ी - जिसने आज़ादी की लड़ाई में सक्रिय योगदान दिया था, पूरी तरह परिदृश्य से बाहर नहीं हुई थी, और न ही आज़ाद भारत में जन्मी पीढ़ी अभी सत्ता पर काबिज़ हो सकी थी। यह सभी जगह लागू था - राजनीति, खेल, कॉर्पोरेट (इसका तब नाम भी नहीं सुना था लोगों ने) व्यवसाय, फ़िल्म और समाज। अभी वैयक्तिक स्वतंत्रता और अभिव्यक्ति की स्वतन्त्रता के नाम पर कुछ भी कर गुज़रने की सोच नहीं पुख़्ता हुई थी और न ही कोई वाद।

नारीवाद की बातें हो रही थीं - प्रोतिमा बेदी की बॉम्बे की सड़कों पर नग्न दौड़ को विरोध का प्रतीक कम और चटख़ारे ले कर फुसफुसाने की चीज़ ज़्यादा समझा गया था। "बॉबी" को आज देखने वाले यह समझ ही नहीं पाएँगे कि उस समय इस फ़िल्म के प्रति कैसा रुझान और कैसी दीवानगी रही होगी और क्यों किशोर-वय दर्शकों में एक नए तरह की सनसनी फैलाई थी ॠषि-डिम्पल की जोड़ी ने।

"मेरा नाम जोकर" की कलात्मक सोच से बाहर आकर व्यावसायिक, सफल परन्तु कलात्मक मसाला फ़िल्म देने में एक बार फिर राजकपूर ने अपनी दिग्दर्शकीय प्रतिभा का लोहा मनवाया - संगीत की समझ और सेटीय भव्यता से भी बढ़कर - मानव मनोविज्ञान की गहरी पकड़ और अपने से आधी से भी कम उम्र की किशोर पीढ़ी की नब्ज़ पहचानने की अपनी क़ाबिलियत का झण्डा लहरा दिया।

दुश्मन : वादा तेरा वादा
'दुश्मन' राजेश खन्ना भी राज कपूर और सुनील दत्त के मिले-जुले रूप की ही नौजवान परछाईं थे। अदाएँ उनकी अपनी भी थीं, दिलीप कुमार और बलराज साहनी से प्रेरित भी थीं मगर पेश करने का अन्दाज़ मौलिक था। पहनावा राजेन्द्र कुमार से प्रेरित, उछ्ल-कूद शम्मीकपूर से - मगर नकल किसी की नहीं।

गुलशन-नन्दा के उपन्यासों पर फ़िल्में बनने का यह दौर राजेश खन्ना के नाम पर दीवानगी का दौर था। अपनी ताज़गी भरी अदाएँ - मुस्कान और पलकें झपकाने के मैनरिज़्म उन्हें दिलों पर राज करवा रहे थे, किन्तु वे स्टार नहीं सुपरस्टार थे और जैसे धूमकेतु सा उदय हुआ था उनका - वही गति बनी रही आगे भी।
सो यह मौलिकता और उनका युवा आकर्षण कुछ और समय तक (1975-76 तक) उन्हें ढो पाया और फिर एकाएक लोकप्रियता के चरमोत्कर्ष से उनका पतन उसी तरह हुआ जिस तरह इसी दौरान सत्ता से कांग्रेस और इन्दिरा गान्धी का। देश की सत्ता जाए तो दोबारा मिल सकती है, दिल की नहीं। सो राजेश खन्ना की लोकप्रियता की सत्ता गई - तो गई।

राजेश खन्ना : आपकी कसम
सुपरस्टार युग का अन्त
...और फिर एकाएक लोकप्रियता के चरमोत्कर्ष से उनका पतन उसी तरह हुआ जिस तरह इसी दौरान देश की सत्ता से कांग्रेस और इन्दिरा गान्धी का। देश की सत्ता जाए तो दोबारा मिल सकती है, दिल की नहीं। सो राजेश खन्ना की लोकप्रियता की सत्ता गई - तो गई।

सो अवसरवादिता के चलन के साथ ही भावुकता और राज कपूर जैसे सारे नायक भुलाए जाने योग्य समझे जनता ने। साथ ही भूल गए लोग उन गुणों को - जो वैश्विक स्तर पर पहचाने जाते थे "हिन्दुस्तानी" के रूप में।
अभी तक हिन्दुस्तानी दर्शक अपने 'जनता' होने का नासूर दिल में लिए, फ़िल्म में बहुत देर से आती पुलिस और अपने नायक के मित्रों (कभी-कभी हीरोइन या हीरो की बहन, माँ आदि भी) के सत्प्रयासों से पकड़े गए खलनायक को पुलिस के हवाले कर देने से थक और पक चुका था।

खलनायक भी जो पहले "धन" के सहारे शोषण करते थे और बाद में उनका हृदय-परिवर्तन भी हो जाया करता था, अब अन्त में जेल जाने लगे थे क्योंकि वे अपहरण, बलात्कार आदि तक पहुँच चुके थे। "सुक्खी लाला" की जगह अब "लॉयन" ले चुका था, या फिर कम से कम जग्गा, बिल्ला, मैक या कोई टोनी…

जब खलनायक हीरो बनना
चाहते थे…
इस दौर की फ़िल्में भी अब खलनायक के जेल जाने के बाद से शुरू होने लगी थीं - कि खलनायक ने कैसे जेल से भाग/छूट कर बदला लिया या नायक की तात्कालिक जीत को उसे बाद में कैसे भुगतना पड़ा। तो इस दौर की फ़िल्मों को पिछ्ले दौर की फ़िल्मों से आगे के कथानक के अब वहाँ से सूत्र मिलने लगे जहाँ पहले फ़िल्म समाप्त हो जाती थी। मूलमन्त्र 'बदला' बना अब।

इस "बदला" रोग से ग्रसित सब हुए - देव'आनन्द, राजेन्द्रकुमार, सुनीलदत्त आदि से लेकर नवोदित किशोर पीढ़ी के कलाकार तक।

शेरख़ान प्राण!
पहले नायक की भूमिका देव साहब
को ऑफ़र हुई थी…! 
"ज़ंजीर" निर्विवाद रूप से इस दौर की ऐतिहासिक फ़िल्म रही जो हिन्दी सिनेमा का अति-महत्वपूर्ण टर्निंग प्वाइण्ट थी।

इस समय तक अपनी और अपने नायक की विवशता और चौतरफ़ा ग़रीबी-बेरोजगारी की हालत से ऊबी हुई जनता - जो हक़ीक़त में पहले ही ऐसी स्थितियों से दो-चार हो रही थी अपने नायक की बदले की भावना से की गई हिंसा को सही मानने और सर-आँखों लेने लगी। जब कोई रास्ता नहीं बचता - मजबूर के पास - तो हिंसा जन्म लेती है। हिंसा हमेशा विवशता से उपजती है, चाहे वह विवशता किसी भी चीज़ से उपजी हो - शायद कायरता से भी।

हिंसा और दबे-कुचले आक्रोश की उपज सलीम-जावेद ने ख़ूब काटी और इसी समय बनी 'शोले'।

फ़िल्मों में भारतीय परिस्थितियाँ तो थीं - मगर कथानक अक्सर हॉलीवुड की सफलतम फ़िल्मों से रूपान्तरित और कभी-कभी सीधे आयातित होने लगे। आयातित मसालों में सबसे ज़्यादा असर रहा कराटे और कुंग-फ़ू या मिलती-जुलती मार्शल आर्ट्स सीक्वेंसेज़ से भरी फ़िल्मों का। विदेशी फ़िल्मों की तरह यहाँ पूरी तरह इन युद्ध-कौशलों पर आधारित फ़िल्में तो बन नहीं सकती थीं - क्योंकि हिन्दी फ़िल्मों के नायक को नायिका भी चाहिए होती थी - गाना भी गाना होता था और नाचना भी, और भी बहुत सी मसरूफ़ियात होती थीं। आख़िर नायक है - नाकारा तो नहीं!

 ज़ाहिर है कि जीवन-दर्शन भी इस दौर में पाश्चात्य रंग में रंगा ही नहीं बल्कि आकण्ठ डूब गया और भारतीयकरण के बावजूद हथियारों पर निर्भरता, नायक की सुपरमैनीयता सहित एक साथ चार, फिर छ्ह फिर दस-बीस और आगे जाकर मिथुन चक्रवर्ती - गोविन्दा के दौर तक पहुँचते-पहुँचते तो पूरी सेना को अकेले दम "उड़ा डालने" की क्षमता बढ़ती चली गई। यह दौर हिंसा और उद्दण्ड - उच्छृंखलता के नाम रहा और कुछ दोयम दर्ज़े के गुनगुनाए जा सकने वाले संगीत के भी नाम। हालाँकि कुछ बहुत अच्छी फ़िल्में भी आईं और कुछ उत्कृष्ट संगीत भी दिया इस दौर ने - मगर वह इस दौर के संदर्भों से परे था - ऐसी अच्छी फ़िल्में और घटिया फ़िल्में तो हर दौर में बनती रही हैं।

त्रिशूल: ख़ाली जेब से
नामी बिल्डर की बराबरी
तक का सफ़र
हिन्दुस्तानी जनमानस अपनी छवि देखना चाहता था अपने नायक में - जो शहर में आता था जेब में बिना पाँच फूटी कौड़ियों के (त्रिशूल) और हौसले और जुनून के सहारे टक्कर देता था नामी बिल्डर को - उसी के खेल में - उसी की चालें चल कर,
"तुम मुझे वहाँ तलाश कर रहे हो और मैं
तुम लोगों का इन्तज़ार यहाँ कर रहा हूँ पीटर"
या कंधे पर रस्सी और होठों पर बीड़ी मगर दिल में जज़्बा सर्वहारा जैसा - कि मेरे पास खोने को कुछ नहीं है - हर संघर्ष के अन्त में कुछ-न-कुछ मिलेगा ही मुझे (दीवार)।
आत्माभिमान - ख़ुद्दारी की बिजली जैसी तड़क भी ख़ूब जमती थी दर्शकों-जनता को -"मैं फेंके हुए पैसे आज भी नहीं उठाता"।

पोस्टर की कला का लोप हो गया - मक़बूल फ़िदा हुसैन जैसे
और जाने कितने कलाकार रहे होंगे जो पोस्टर की कमाई से
ही पले होंगे…
अब तो कंप्यूटर+फ़्लेक्स-प्रिंटिंग ने सबका गला तराश दिया।
मगर इस दौर में जहाँ एक ओर स्थिति इतनी ख़राब हो चली कि आपात्काल घोषित हुआ, वहीं बावजूद सारे प्रशासनिक दमन और सेंसरशिप के, घुटन के साथ ही कानून और प्रशासन का निरादर, अवज्ञा और अवहेलना बढ़ते-बढ़ते अपने चरम तक पहुँचने लगे। आम आदमी के सपने भी बस रोटी से ज़रा ही आगे बढ़ पाते थे - और ख़ास लोगों के सपने मकान तक पहुँच जाया करते थे…

हाए-हाए ये मजबूरी : ज़ीनत अमान और बारिश…
मनोज कुमार-उपकार से यहाँ तक आ गए!
[मैं ना भूलूँगा… ]
और इन हालात में यह हम हिन्दुस्तानियों की जिजीविषा ही कही जाएगी कि हम अपनी मजबूरी में भी रूमान तलाश लेते थे - और हमारे दिग्दर्शक हमारी इसी रूमानियत का फ़ायदा उठा कर हमें वही मजबूरी दोबारा फ़िल्म के रास्ते परोस देते थे और जेबें हल्की करवाने में सफल रहते थे।
यह सर्वमान्य था कि नियम-कानून के रास्ते से जी पाना भी मुश्किल हो रहा था और सुविधा-शुल्क अदायगी के बाद किसी भी विभाग से मनचाहे परिणाम पाना संभव था - इन्स्पेक्टर-लाइसेंस राज की बदौलत। इस नज़र से कहा जा सकता है कि यह व्यवस्था जनता की मूक स्वीकृति भी पा चली थी।

भीड़ धार के ख़िलाफ़ नहीं, उसके साथ बहने को ही तैरने का उत्तम कौशल मानती है और सीमाओं में ही निजी उन्नति के स्वार्थी अवसर भी तलाशती है - भले ही समाज को उसकी कोई भी क़ीमत चुकानी पड़े।

यही दृष्टिकोण आने वाली पीढ़ियों के प्रति भी बनाए रखना ही व्यावहारिक बुद्धिमत्ता के उत्कर्ष की निशानी समझी जाती रही है - सीमित संसाधनों और असीमित लालसाओं से जगमगाते जन-गण-मन में - जहाँ आचरण की शुद्धि के लिए मानदण्ड और मापदण्ड जब-जब तलाशे गए तो उच्च-पदासीन, धनी और लब्ध-प्रतिष्ठ लोगों की ओर ही देखा जाता रहा।

यह क़ाबिले-ग़ौर है कि यही वह समय था जब धीरूभाई और रिलायन्स का उदय भी हो रहा था।
ये कहानी भी कम फ़िल्मी नहीं थी…
यह दौर भी अमिताभ की नायक अवधि की तरह ज़रा लम्बा ही चला - 80-82 के आसपास पहला बदलाव झलका मगर बदलाव आया 1990 के भी काफ़ी बाद - 1995 से - जैसे विण्डोज़ '95 आया हो।

इस लेखमाला पर एक बहुत जायज़ प्रश्न यह बनता है कि यह विवेचना "नायक" के रास्ते ही क्यों?
क्या नायिकाएँ नज़र'अन्दाज़ किए जाने योग्य ही रहीं?
क्या कहानीकार-निर्देशक-पटकथा लेखक का योगदान महत्वपूर्ण नहीं था?
तो कहना यह है कि समग्र रूप में ही सिनेमा और समाज अन्योन्याश्रित रहे हैं, परन्तु नायक-प्रधान युग से अद्यतन, नायक के रास्ते ही विवेचना की गई है। अलग से नायिका और अन्य अंगों पर भी आगे लेखन का विचार है, परन्तु एक ही लेख में सबका विवेचन बहुत कुछ उलझा दे सकता था। इसीलिए सप्रयास इन अंगों को छोड़ा गया है।
(क्रमश:)

Monday, July 26, 2010

तू इस तरह से मेरी ज़िन्दगी में शामिल है…

ये एक उम्दा मिसाल है कि एक ख़ूबसूरत गाने का घटिया पिक्चराइज़ेशन कैसे किया जा सकता है। मुझे इस गाने के तीनों वर्शन बहुत पसन्द हैं - सुनने में।

Friday, July 23, 2010

कहानी लेखन चर्चा : दो आदमी


आज मेरा मन कहानी लिखने का कर रहा है।

कोई अच्छा लेखक या लेखिका अच्छी कहानी लिखने के गुर बताएगा क्या? नहीं सीखना नहीं है। बस कोई बता दे - तो बाद में हम ये कह सकें कि अरे ये तो हमें पहले से ही आता है।

हम बताएँ?

सुनिए-

1-अंत सुखान्त होना चाहिए।
"अबे शुरू ही अंत से करेगा क्या उल्टी खोपड़ी?"

"आप कौन?"
"मैं तुम्हारे अन्दर का दूसरा आदमी हूँ। अन्तरात्मा की आवाज़"

" मेरा मतलब है कि अपने लक्ष्य के बारे में पहले से ही सुनिश्चित रहना चाहिए न! वर्ना भटकने का बहुत अंदेशा रहता है।"

"अच्छा आगे चलो"

2-वर्तनी की त्रुटियाँ नहीं होनी चाहिए।
"ये तो सारे लेखन पर लागू होता है।"

3-शुरुआत अच्छी होनी चाहिए।
"काहे नहीं!"

4-बहुत बोझिल और उपदेश से भरी कथा न हो। बहुत हल्के स्तर की भी न हो। उथलापन न झलके।
"तो?"

5-पात्र अपने आस-पास के हों, पाठकों को अपने आस-पास के लोग, जीवन और रोज़मर्रा की समस्याओं और भावनाओं की झलक मिलनी चाहिए।

"हूँ।"

6-आजकल पुरानी मान्यताएँ टूट रही हैं, वर्जनाएँ भी शिथिल हो रही हैं। कुछ नयापन हो।

"हम समझ गए।"

"क्या?"

"कि तुमको कुछ आता-जाता नहीं है"

"वो क्यों?"

"आता होता तो सिखाते काहे? खुदै न लिख लेते?"

बड़ी ख़राब बात है। यानी मैं अपने ही आगे निरुत्तर हो गया।
वैसे नि:दक्षिण हो जाता तो और ख़राब होता। दान से ज़्यादा दक्षिणा पर ध्यान देते हैं गुणीजन।
मगर ताव आ गया, सो हमने भी सोचा कि अब कहानी लिख के ही दिखाते हैं। लोग हनुमान जी को तंग करते हैं, कभी रचना सिखाने के लिए, कभी राम जी से मिलाने के लिए, हमारे अन्दर तो अन्तरात्मा की आवाज़ बोली है। बहरहाल हम अब लिख के ही मानेंगे।
हमने कहानी शुरू कर दी फिर …
+++++++++++++++++++++++++
"एक बार की बात है …"

"इसमें बहुत पुरानापन है"

"तो क्या करूँ? नयापन कैसे लाऊँ?? ये कहूँ कि दो बार की बात है…??? "

"नहीं वो बात नहीं है"

"तो फिर क्या बात है?"

"मतलब कोई बच्चों को थोड़े ही सुना रहे हो कहानी"

"और बड़ा कौन है यहाँ?"

"ये मत पूछो"

"क्यों?"

"पिट जाओगे"

"क्यों? कौन पीटेगा? और क्यों पीटेगा?"

"अरे तुम समझते नहीं हो, ब्लॉग-जगत में बहुत सेंसिटिव हो जाते हैं लोग, बड़े-छोटे के सवाल पर। सेंसिटिव समझते हो न? "

"ये कैसे समझ लिया कि ब्लॉग पर ही लिखूँगा?"

"ब्लॉग के अलावा लिखने की तुम्हारी औक़ात  है क्या?"

अब तक मैं छ्क भी गया था और पक भी गया था, अपने अन्दर के इस दूसरे आदमी से। कम्बख़्त तब से टोके जा रहा है - कुछ करने ही नहीं देता। सो रहा नहीं गया, और बोल पड़ा-

"अबे ओऽऽऽ"

"क्या है भाई? इतना ग़ुस्सा किसलिए?"

"मैं बहुत देर से सह रहा हूँ तुझे। अब अपनी बक-बक बन्द कर"

"ये आप ठीक से नहीं कह सकते? आख़िर मैं भी "तुम" ही तो हूँ!"

"हद है! पीछे ही पड़ गया है तू। अबे ओ शरद कोकास के दूसरे आदमी, तुझे मेरे ही अन्दर घुसना था? अब चुप मार के बैठ। तू मुझे नहीं जानता मैं कौन हूँ"

"मुझे जानना भी नहीं है। ये तो शरद भाई ने तुम लोगों की भलाई सोची जो केदारनाथ सिंह जी के दो आदमी बुलाए। अगर निदा फ़ाज़ली को बुला लेते तब क्या करते तुम?"

"मतलब?"

"मतलब वो निदा फ़ाज़ली ने कहा है न-
'हर आदमी में होते हैं दस-बीस आदमी
जिसको भी देखना तो कई बार देखना' "

"धमकी दे रहा है अपने आदमियों की?"

"न मैं धमकी नहीं दे रहा, बस अभिभूत हो रहा हूँ"

"अब चुप कर तू - मैं उभरता हुआ सबसे बड़ा ब्लॉगर तो हूँ ही, सबसे बड़ा कहानीकार भी हूँ। तेरा अभी-भूत यहीं हो जाएगा - एनकाउण्टर!"

"अब आप धमकी दे रहे हैं"

"मैं तो सिर्फ़ अर्ज़ कर रहा हूँ। सब सोच लिया है मैंने - देख! एक तो मैं हर दस दिन में लिख दिया करूँगा - फिर ख़ुद केवल टिप्पणियाँ बाँटना (अबे रेवड़ी नहीं - टिप्पड़ी, धत् टिप्पणी) और अभिभूत होना। फिर और जब मौका मिले तो मौज लेना, सीमा तय किये बिना।

जब कहीं लगे कि गलती हो गई तो बिना शर्त माफ़ी माँग लेना। फिर ब्लॉगिंग के 101 सिद्धान्त जारी करूँगा, जो सबको याद होने चाहिए। कमेण्ट देने के लिए "सिद्धान्त वेरीफ़िकेशन" लागू करवा दूँगा। इससे ज़्यादा क्या आरज़ू हो सकती है किसी की ब्लॉग-जगत में? इतना तो तीन जने मिल कर भी नहीं कर पाते। हम तो सिर्फ़ दो हैं।"

"और वो कहानी लिखना?"

"अमें यार कहानी तो मैं ख़ुद बन जाऊँगा! लोग लिखेंगे मुझ पर। शोध-प्रबन्ध प्रकाशित होंगे, जाने क्या-क्या!"

"और बाक़ी लोग?"

"वो बड़े बन चुके - अब वो और ऊपर थोड़ा ही जा सकते हैं - न्यूटन ने बताया था न, हर ऊपर जाने वाली चीज़ एक लिमिट के बाद नीचे को आती है?

"सो तो है, मगर क्या पता न्यूटन अगर ग़लत निकला तो? वैसे भी पुरानी बात हो गयी - उसके ज़माने में ब्लॉग-श्लॉग होते थे क्या?"

"अगर ग़लत निकला तो इस खोज का श्रेय ले लेंगे हम। लेकिन अगर न्यूटन सही निकला - तो? बड़ी चिन्ता हो रही है हमें अब तो न्यूटन जी की।"

"अब तो लगता है तुम वाकई श्रेष्ठ हो गए"

"अच्छा! कैसे भला?"

"अरे अब तुम्हें भी तो चिन्ता होने लगी है…"

सो हमारी कहानी अभी चिन्ता के घेरे में आ गयी है, ज़रा चिन्तन कर लें फिर कहानी लिखते हैं।
"ए रामसुमेर भाई! चाय बन गयी क्या? अब चाय पी लें तो ज़रा ठीक से चिन्ता की जाय…"

Monday, July 12, 2010

गणपतिं प्रणमाम्यहं

वक्रतुण्ड महाकाय सूर्यकोटिसमप्रभ
निर्विघ्नं कुरु मे देव सर्वकार्येषु सर्वदा
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वक्र (घूमी हुई/मुड़ी हुई) सूँड़ वाले और बड़े आकार के शरीर (लम्बोदर) देव (जो) करोड़ों सूर्यों के समान प्रकाश वाले (हैं, वे) मुझे सभी कार्यों में विघ्न (बाधा) रहित करें!


अभिव्यक्ति को अक्षर-शब्द-अर्थ-रस-छ्न्द सहित कल्याणकारी बनाने की प्रार्थना:
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वर्णानामर्थसंघानाम् रसानाम् छन्दसामपि
मङ्गलानाञ्चकर्तारौ वन्दे वाणीविनायकौ
वर्णों (अक्षरों)और अर्थों के समूहों (अर्थात् शब्दों और उनके भिन्न-भिन्न अर्थों), रसों और छन्दों के सृजन करने वाले तथा कल्याणकारी (हैं जो, ऐसे) वाणी (सरस्वती) और विनायक (गणेश) की (मैं) वन्दना कर(ता/ती) हूँ।


एक और प्रणाम - श्रद्धा और विश्वास को!
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भवानीशङ्करौ वन्दे श्रद्धाविश्वासरूपिणौ
याभ्यां विना न पश्यन्ति सिद्धा: स्वान्तस्थमीश्वरम्
(उन) भवानी और शंकर की मैं वन्दना कर(ता/ती) हूँ (जो) साक्षात् श्रद्धा और विश्वास के स्वरूप (हैं, और) जिनके बिना सिद्ध भी अपने अन्तस् में (भीतर) स्थित ईश्वर को नहीं देख पाते!

 
एक प्रणाम चोरों के सरताज को!
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व्रजेप्रसिद्धम् नवनीतचौरं
गोपाङ्गनानाञ्च दुकूल चौरं
अनेकजन्मार्जित पापचौरं
चौराग्रगण्यं पुरुषं नमामि!
ब्रजभूमि में माखनचोर, गोपियों के वस्त्रचोर, अनेकानेक जन्मों में इकट्ठे किए हुए (भक्तों के) पापों को (भी) चुराने वाले चोरों में अग्रगण्य पुरुष (अर्थात् श्रीकृष्ण) को नमन कर(ता/ती) हूँ!

 
एक प्रणाम दिव्यदृष्टि को!
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रामो राजमणि: सदा विजयते रामं रमेशं भजे
रामेणाभिहता निशाचरचमू रामाय तस्मै नम:!
(श्री) राम (जो) राजाओं में मणि (सिरमौर हैं), सदा विजेता हैं, (ऐसे श्री) राम (जो) रमा (लक्ष्मी) के पति (हैं, अर्थात् श्रीविष्णु) को (मैं) भज(ता/ती) हूँ, (जिन श्री) राम के द्वारा निशाचरों की सेना मार दी गई, उन (श्री)राम को नमन है।
एक प्रणाम अनन्यभक्त-सेवकशिरोमणि-विद्याबुद्धिबलप्रदाता महावीर को, सीतारामसहित!
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सीतारामगुणग्राम पुण्यारण्यविहारिणौ
वन्दे विशुद्धविज्ञानौ कवीश्वरकपीश्वरौ
सीता-राम के गुणों के ग्राम और पुण्यों के जंगल में विहार करने वाले जो स्वयं विशुद्ध विज्ञान (साक्षात् विशेष और सम्यक् ज्ञान) हैं उन ज्ञानियों में श्रेष्ठ - कपियों में श्रेष्ठ (हनुमान जी) का (मैं) वन्दन कर(ता/ती) हूँ ।

(अनुवाद में कुछ तकनीकी गड़बड़ हो सकती है, मुझे संस्कृत आधिकारिक तौर पर नहीं आती है)
 
और यह सब राजीवनन्दन की हिन्दप्रभा पर पहली पोस्ट से प्रेरित, आभार सहित!
पुनश्च:
प्रथम चार श्लोकों का अनुवाद, यथा-शक्ति अंकित कर दिया है - डॉक्टर महेश सिन्हा जी और श्री वीरेन्द्र सिंह चौहान जी की सलाह के अनुसार। शेष फिर…

Wednesday, June 23, 2010

नए ब्लॉग अनुभव दर्ज करने की तैयारी

"इक मीर था - फिर इंशा थे - फिर फ़ाज़ली निदा; फिर फ़ाकामस्ती की हमीं ने ओढ़ ली रिदा"
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ऐसा नहीं कि मैंने नए ब्लॉग कम पढ़े
ऐसा भी नहीं है कि पुरानों से कट गया
कीचड़ की सल्तनत का देख राज्याभिषेक
मन ही तो है - कुछ दिन के लिए दूर हट गया

देखा कि लोग आते हैं बेकार बात पर
अख़बार जैसी पोस्ट पर - या ज़ात-पाँत पर
चिट्ठे का नाम लिख दो तो आ जाएँ टीपने
वर्ना लगेंगे अच्छी भली पोस्ट लीपने

कुछ लोग आए सोच के अहसान करेंगे
कुछ आए कि हम आगे उनका ध्यान करेंगे
देखा तो बयालीस लोग टीप चुके थे
हम सोच के बोझे से थके और झुके थे

क्या हो गया ! हमने तो बस अनुभव किए थे दर्ज
लगता है टिप्पणी भी है इक "वोट" जैसा मर्ज़
लगने लगा कि कैसे चापलूसी करें हम
वर्ना सज़ा भुगतने का लाएँ कहीं से दम

फिर यूँ हुआ कि हमने हौसला नहीं खोया
झूठे तकल्लुफ़ात का रोना नहीं रोया
तय पाया कि फिर दर्ज ख़यालात करेंगे
जो भी हो - हौसले से अपनी बात कहेंगे

तो अब यही सोचा है कि अपने ये तज्रुबात
बाँटेंगे, मगर बाँटेंगे अपने ही ख़यालात
जो सच है वही सच, जो कबूतर वो कबूतर
गिरगिट है तो गिरगिट, जो फ़टीचर तो फ़टीचर

जाएगी झूठी दोस्ती तो जाय आज ही
इस डर का हमें करना पड़ेगा इलाज ही
कुछ भी न रहे - बाक़ी है ईमान तो क्या ग़म
दुनिया से क्या? ख़ुद अपनी नज़र में तो जँचें हम
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यानी इस फ़ैसले के बाद अब चला जाय नए ब्लॉग अनुभव लिपिबद्ध करने। वक़्त लगेगा थोड़ा, मेहनत भी।
अब देखें कौन कहता है - 'दाग़' अच्छे हैं।
"धुलाई का पक्का वादा, सफ़ाई कम, क़ीमत ज़्यादा"