साथी

Tuesday, June 8, 2010

पीपीपी : पब्लिक प्राइवेट पार्टनरशिप के नए अर्थ

हमारे एक सहकर्मी आईएसबी हैदराबाद में एक सरकारी प्रायोजित सेमिनार से हाल ही में लौटे। हमने अपनी आदत से मजबूर, छेड़ा - "ज़रा ये समझाइएगा भाई! ये पी-पी-पी क्या है? बहुत सुन रहे हैं आजकल कि कई सरकारी प्रोजेक्ट यथा संभव पी-पी-पी मॉडेल के तहत क्रियान्वित किए जाएँगे।"
मैनेजमेण्ट में एक्सपर्ट लोगों की समितियाँ रेलवे में भी गठित हुई हैं, एक ज़ोनल नोडल अधिकारी भी नामित हुए हैं जो सिंगल-विण्डो के रूप में रेलवे और प्राइवेट पक्षों के बीच समन्वय कर सकेंगे।
चर्चा एक अन्य वरिष्ठ सहकर्मी के कक्ष में हो रही थी, दोपहर बाद के चायपानावकशान्तर्गत। वहाँ एक अन्य ज्ञानी सहकर्मी भी उपस्थित थे, जो प्रबन्धन-पाठशालाओं के सेमिनार-प्रेज़ेण्टेशन-केस स्टडी द्वारा मानवीय मस्तिष्क में ठेले जा रहे ज्ञान के बदले अनुभव की पाठशाला से व्यावहारिक जगत में निष्णात होने पर अधिक आस्था रखते हैं।
भाई साहब ने आईएसबी-पलट ज्ञान धैर्यपूर्वक सुना, सरकारी सर्कुलर जनित ज्ञान उनके पास भी था और अन्य लोगों के पास भी - जो चर्चित हुआ। अब भैया उवाच -"देखो! आप लोग दो मिनट हमारी भी सुनो।"
हम लोग उस प्रकार उनकी ओर अपने मन-बुद्धि-विचार केंद्रित कर के बैठ गए जैसे एकदा नैमिषारण्ये…
भाई साहब उवाच -
"देखो मान लो कि हम पॉलिटीशियन हैं। हिमान्शु जी ऐसे पढ़े लिखे आदमी हैं जो हमारे चुनाव में और सत्तासीन होने में प्रत्यक्ष-परोक्ष रूप से सहायक हुए हैं, और अभी आगे भी सहायक या घातक सिद्ध हो सकते हैं, परिस्थिति-जनित हमारे प्रति मोह या मोह-भंग के अनुसार। एतना त समझ गए न?"
हम सबने समवेत हुँकारी भरी।
"तो फिर क्या है? आगे तो सब किलियरै है भाई! अब हम इनसे पार्टनरशिप कर लेंगे, कि कैसे सरकारी-पंचायती-सार्वजनिक या पब्लिक सेक्टर के अन्तर्गत आने वाली चीज़ों का साझा हम कानूनी तौर पर इनसे इस तरह करें कि ये भी लाभान्वित हों और हम भी, और देश-जनता यही समझती रहे कि नए मॉडेल का मैनेजमेण्ट हो रहा है, और फ़ायदा जनता का होगा। समझे?"
कुछ-कुछ तो समझे थे, परन्तु हमने और जानने की जिज्ञासा प्रकट की।
"अरे ई वही है - पढ़ेलिखे-पैसेवाले की पॉलिटीशियन से पार्टनरशिप"
अब हमने पूछा - "तब तो चार 'पी' होने चाहिए थे न इसमें? पैसेवाले का 'पी' कहाँ गया?"
उत्तर मिला - "इसमें, बल्कि ऐसे हर मामले में पैसे वाला 'पी' साइलेण्ट रहता है। काहे से कि पैसा के बिना तो कुच्छो नहीं हो सकता, ऊ तो सबमें हइयै है। अलग से लिखना जरूरी नहीं है - न बोलना।"
एक और प्रश्न उछ्ला - "लेकिन ये पी-पी-पी ही क्यों? कुछ और नाम क्यों नहीं?"
गुरू हँसे। रुके, फिर हँसे, और बोले -"अगर इतना ही समझते होते तो तुम ही लोग न लग जाते पी-पी-पी में?
अरे भाई, जब ये सब कुछ पैसा के ही बारे में है, तो क्या ये पैसा, पैसा और पैसा समझ रहे हो?"
हमने फिर सहमति में गरदन हिलाई।
उन्होंने स्पष्ट किया - " नहीं भाई! पैसा तो साइलेण्ट है, वो प्रकट न हो जाए, इसीलिए पीपीपी - यानी पब्लिक के पैसे को पी,  और पी के प्राइवेट बना, यहाँ तक कि पू्रा पैसा पी जा…"
"और हाँ, ऐसी कोई मीटिंग भी पिए बिना नहीं होती, सो पी, पी, और पी…"
अब तक कई अर्थ और उद्भासित होने लगे थे, सो हम धन्यवाद करते हुए निकल लिए उस बैठक से।
हम तो यही सोच रहे हैं कि पब्लिक का माल प्राइवेट बनाने के लिए पैसा चाहिए, सो है नहीं हमारे पास, इसलिए "पानी पी और पिला।"
आप इस "पी-पी-पी कोष" को और समृद्ध कर सकें तो आपका आभार…

Saturday, June 5, 2010

धुने गए पन्नालाल - गणतन्त्र दिवस की पूर्वसंध्या पर सच बोलकर

यह पुर्जी आज पड़ी मिली। जनवरी 26 को गणतंत्र दिवस का "दैनिक हिन्दुस्तान अख़बार" पढ़ने के बाद जो मन में आया, वहीं अख़बार पर टीप दिया। जब ब्लॉग पर आया फ़रवरी में, तब ये थोड़ा ही सोचा था कि इसे ब्लॉग पर ले जाना होगा। फिर जब ये मिला आज, तो थोड़ा सा श्रम करके उस अख़बार को भी ढूँढ निकाला, और स्कैन कर के ले आया हूँ।
अब अन्त में यह भी कि पुर्जी  आज ही क्योंकर मिली ? 
मैं अपना आवास बदल रहा हूँ। नये आवास में जाने के पहले सभी सामान सहेजने में उम्मीद है कि और भी बहुत सी खोई हुई चीज़ें मिलेंगी - और कई तो शायद ऐसी भी  चीज़ें मिलें -जो खो गयीं यह बात भी हमें पता न हो।
--------------------------------------------------------------------------------------------------------
रचना से पूर्व यह ख़बर पढ़ें - 26 जनवरी 2010, दैनिक हिन्दुस्तान से-

धुने गए पन्नालाल - सच बोलने पर





































जय हो!
तो सबकी जय बोलने के बाद पेश है
अब यह हज़ल -

मुँह पे सच बोलते हो पन्नालाल!
तुम निहायत "वही" हो पन्नालाल।

पिटके ख़ुद, आक़ा को भी पिटवाया
उससे नाराज़ क्यूँ थे पन्नालाल?

तुम जेहादी नहीं हो माना, पर
उससे कम भी नहीं हो पन्नालाल

जिसकी लाठी हो - सिर्फ़ भैंस नहीं,
अब है सब कुछ उसी का पन्नालाल

भ्रष्ट वो - भ्रष्ट को - जो भ्रष्ट कहे,
क्यूँ समझते नहीं हो पन्नालाल!

तुम इशारों की छोड़कर भाषा-
मराठी सीख लो न पन्नालाल

मैं भी सच बोलने को कहता हूँ-
अब किसी से न कहना पन्नालाल

तुमको चालाकी सिखाने मैं चला-
मैं भी कितना गधा हूँ पन्नालाल!

मुल्क़ आज़ाद लोकतन्त्र सही,
यहाँ गणतन्त्र भी है पन्नालाल

Wednesday, June 2, 2010

कम्युनिस्ट और कम्युनिज़्म : नज़रिया

अक्सर किसी विचारधारा - किसी आन्दोलन के बारे में राय बन जाती है उस समूह के उन चन्द लोगों के आधार पर जो आपके सम्पर्क में, आपकी नज़र में आते हैं। मुझे पता है कि ऐसा नहीं होना चाहिए, मगर मैं आदर्श स्थिति की नहीं, रोज़ाना की ज़िन्दगी की बात कर रहा हूँ।
बहुत बड़े स्वप्नद्रष्टा– नारों से फटे गले और आदर्शों के बोझ तले झुके कन्धों वाले कम्युनिस्ट जिनके लिए मलिन और गन्दा रहना स्टारडम हो, हर धर्म को गरियाना जिनका धर्म हो और सिगरेट, चाय, शराब या अन्य नशों की लत से जूझते हुए – समाज के नियमों को सिर्फ़ तोड़ने के लिए तोड़ कर – कुछ सन्तानों को अलग-अलग तीन-चार या कभी-कभी एक ही कोख में स्थापित करने की उपलब्धि से निपट कर किसी गन्दी सी बीमारी से यह संसार छोड़ भागने वाले लोग या चरित्र मुझे नहीं सुहाते।
कम्युनिस्ट सब ऐसे नहीं होते, उस विचारधारा में बहुत सी अच्छी बातें भी ज़रूर हैं, मगर ज़्यादातर ऐसे ही लोग मिले मुझे कम्युनिस्ट के चोले में - जीवन में भी और कहानियों में भी, सो कभी सहज नहीं हो पाया इस विचारधारा के साथ।
एक भी शख़्स ऐसा नहीं जानता मैं जो विचारधारा से कम्युनिस्ट हो और चाय-सिगरेट-शराब न पीता हो, जो विवाह की संस्था का सम्मान करता हो - इसलिए नहीं कि जन्मजात यह सीखा हुआ है उसने - बल्कि इसलिए कि यह कम्युनिस्ट विचारधारा में है।
ऐसा कम्युनिस्ट जो ख़ुश रहता हो, ख़ुशियाँ बाँटता हो या बाँटना चाहता हो और नियमित व्यायाम आदि करके शरीर के प्रति भी अपना आदर और सम्मान प्रकट करता हो, नहीं देखा।
कम्युनिज़्म ने क्या सिखाना चाहा था - पता नहीं, मगर यह ठीक लगता है कि सबके बच्चों को अपना बच्चा समझें - अनर्थ यह हुआ कि अपने बच्चों को भी ज़्यादातर सबका बच्चा समझ लिया गया - या फिर किसी का नहीं।
अभी हाल में अशोक पाण्डे के ब्लॉग पर गया था। उनका अपनी बच्ची के प्रति लगाव देख कर बहुत अच्छा लगा मुझे। भीग गया अन्दर तक। वे कम्युनिज़्म से प्रभावित हैं, और कुछ अलग भी हैं। ज़्यादातर कम्युनिस्ट भिगोते नहीं, भिगो कर मारते हैं।
धर्म को अकर्मण्यता या भाग्यवाद के रूप में न लिया जाय, यह बात समझ सकता हूँ मैं, मगर धर्म के प्रति निरादर का भाव - यह किसी को भी गिरा देता है मेरी नज़र में। आप मेरा धर्म न मानें - चलेगा। मगर आप किसी के भी धर्म का अपमान करें - यह नहीं चलेगा। आलोचना चल सकती है, दायरे में रह कर।
इस से नतीजा यह निकला कि मैं कभी कम्युनिज़्म के बारे में ठीक से यह समझ नहीं पाया कि किताबों के स्तर पर समाज के लिए इतना प्रभावी और आकर्षक होते हुए भी कभी यह प्रथम विकल्प क्यों नहीं बन पाया।
एक अकेले मेरे न समझ पाने और कम्युनिज़्म से अरुचि सी हो जाने से क्या फ़र्क़ पड़ता है? सही है, मगर मेरे जैसे और भी तो होंगे। विरोध में विकसित हो चुके पूर्वाग्रहों वाले मस्तिष्क को भी यदि बात समझाई जा सके, तभी सफलता है प्रचारकों की, तभी सफलता मिल सकती है किसी आन्दोलन को; या फिर स्वेच्छा से रुचिकर लगे, ऐसा कुछ हो उस धारा में।
इस मामले में भी मैंने अधिकतर कम्युनिज़्म-प्रवर्तकों को अधैर्य-ग्रस्त पाया जो शीघ्र ही वाचिक हिंसा और / या बौद्धिक आतंकवाद का सहारा ले बैठते हैं।
मुझे लगता है कि जो धारा प्रमुखत: उन्हीं का आह्वान करती हो, उन्हीं पर आधारित हो जिनको सर्वहारा कहें तो एक जन्मजात आक्रामकता होना लाज़मी है उस समूह में।

Wednesday, May 26, 2010

अभिव्यक्ति - 3

सत्यार्थमित्र की इस पोस्ट ने प्रेरित किया हमें अपने विचार आज साझा करने को। यह शुद्ध मौजी पोस्ट है, यदि किसी को भी अपमान-जनक या अश्लील लगे तो अवश्य बताएँ। आपत्ति देखने तक यह पोस्ट लगी रहेगी और आपत्ति की दशा में अविलम्ब हटा ली जायगी, मगर आपत्ति का प्रभावित-जनों में से किसी के द्वारा होना अनिवार्य है।
हमारे एक मित्र हैं, बड़े गर्व से जब हो तब कॉलर ऊँचा करके फ़र्माते हैं - "देखिए जनाब! अब हम कोई मेहरा तो हैं नहीं, जो…"
उन्हें कॉलर ऊँचा करने का बहुत शुक़ है। फ़र्माने का भी। और उनकी निगाह में "मेहरा" होना जैसे कोई हेय-निन्दनीय लेबल हो।
"मेहरा होना" अपने लाक्षणिक अर्थ में ही प्रयुक्त होता है। इस शब्द के लाक्षणिक अर्थ हैं - घर में घुसे रहने वाला, जो आसानी से दबाव में आ जाय, कोमल स्वभाव का, विनम्र, हिंसात्मकता और आक्रामकता से परे, विवादों से बचने वाला…इत्यादि। मूल रूप में इसे "स्त्रैण" के पर्याय के रूप में ही समझा जाता था, मगर बदलते समय के साथ अगर अब भी इसे "स्त्रैण" का पर्याय ही मान लें तो अर्थ बदल जाएँगे, काफ़ी कुछ विपरीत होंगे वर्तमान प्रचलित अर्थों के।
"मेहरा" तत्व की प्रधानता होने पर उस मेहरात्व को "मेहरपन" कहा जाता है। मगर "मेहरपन" होते ही लाक्षणिकता एक और अंगड़ाई लेकर सीमित हो जाती है "स्त्री-सुलभ श्रृंगार-प्रियता, नज़ाकत या कोमलता और ख़ासकर चुगली - एक की बात दूसरे से कहना, निन्दा इत्यादि रसों का समावेश करके" तक। इनमें से भी चुगली और इधर-की-बात-उधर करना प्रधान।
ब-हर-हाल, अक्सर यह प्रमादी-प्रलाप उनकी पत्नी भी सुनती रहती थीं, मगर एक दिन उन्होंने बड़े मज़े में दिलीप वेंगसरकर का प्रिय शॉट खेला - लेग-ग्लान्स किया अपने पतिदेव के कमेण्ट को। (कलाई के सहारे खेले जाने वाले इस "ग्लान्स" शॉट की ख़ूबसूरती यही है कि आप केवल दिशा देते हैं गेंद को, सिर्फ़ सही टाइमिंग का प्रयोग करके आप गेंदबाज़ की सारी आक्रामकता का लाभ अपने हित और उसकी टीम के विपरीत कर लेते हैं)
उन्होंने इस मेहरा शब्द का एक अन्य अर्थ जो पंजाबी उपजाति या सरनेम के तौर पर प्रयुक्त होता है (जैसे विनोद मेहरा) के सफल प्रयोग के सहारे कहा- "हम कहाँ कहते हैं कि आप मेहरा हैं - आप की तो उम्र ही इसी में बीत रही है कि 'कपूर' बने रहें, कपूरी कम न होने पाए।"
"सो तो हई है, और क्या हम तुम्हारे भाइयों की तरह मेहरा हैं? क्यों दोस्त?"
- इस बार उन्होंने हमसे तस्दीक़ चाही अपने कपूरत्व की।
हमें मौक़ा मिला, और राह तो दिख ही गई थी उनकी धर्मपत्नी के उवाच से - सो हम भी उवाचे - "अरे नहीं भाई! आप पक्के कपूर हैं। ये अलग बात है कि कभी-कभी 'चड्ढा' हो जाते हैं"
अब उनकी पत्नी हँसीं - ज़ोर से - और बोलीं - "सही कहा आपने, 'चड्ढा' तो ये होते ही रहते हैं। 'कपूर' तो इनका सबसे अच्छा फ़ॉर्म है।"
हम ने आगे जोड़ा - "हाँ ये भी सही है, 'चड्ढा' भी बने रहें तो ग़नीमत, वर्ना ये तो 'खुल्लर' भी हो सकते हैं, क्योंकि मेहरा तो हैं नहीं। क्यों भाई?"
और बात सिर्फ़ छह-सात महीने पुरानी होने पर भी, भाई ने अपने कपूर होने की बात पर काफ़ी अंकुश लगाया है। दूसरों को मेहरा बताने पर भी। आख़िर, उन्हें अपनी कपूरी क़ायम जो रखनी है, क्योंकि मेहरा तो वो हैं नहीं!
--------------------------------------------------------------------------------
इशारों को अगर समझो…
पिछली बार एक टिप्पणी थी कि दक्षिण भारतीय भाषाओं की भी सहभागिता हिन्दी में बढ़ाने पर प्रयास हो। मेरी जानकारी दक्षिण भारतीय भाषाओं की कम ही है, मगर दक्षिण भारतीय भाषाओं ने अंग्रेज़ी को किस तरह अंगीकार किया है, उसकी बानगी आप पा सकते हैं भोजन के लिए प्रयुक्त शब्दों में। आपके लिए जो "मील्स" है, वही मील्स उनके लिए भी है, मगर मील्स के लिए स्थानीय शब्द है -"सापड़"। यदि आप "सापड़" माँगते हैं तो आप नवागन्तुक से अधिक आत्मीय बनने की दिशा में चल पड़े समझिए।
मगर यह "सापड़" है क्या? "सपर" या बोले तो "SUPPER"।
क्या स्वाभाविक सहज अंगीकार है! वाह…

Tuesday, May 18, 2010

कीड़े काटने से सावधान

यह व्यंग्य नहीं है, और अगर पढ़ें तो पूरा पढ़े बिना निष्कर्ष न निकालें, कृपया।
----------------------------------------------------------------------------------------------------
कीड़े काटने के चिह्न
आपने देखा कि नहीं पता नहीं, आजकल कीड़े बहुत काटने लगे हैं। अधिकतर किशोर-युवा पीढ़ी को ज़्यादा काट रहे हैं कीड़े।
महानगरों में, पूर्वोत्तर प्रान्त में, विभिन्न उच्चवर्ग (धन-आधारित) के प्रश्रय प्राप्त हलकों में, कॉलेजों में ख़ासकर, जहाँ डोनेशन आधारित प्रवेश-व्यवस्था लागू हो वहाँ भी। अमूमन ऐसा समझा जाता है कि अच्छे और महँगे इंस्टीट्यूट्स में पर्यावरण भी बेहतर होगा और आए दिन कीड़े-मकोड़े बच्चों-युवाओं को काट लें, यह तो न हो।
सुई लगाने के चिह्न
पूर्वोत्तर और कोलकाता के क्षेत्रों में बात समझ आती है, उस इलाक़े में कीट-पतंग अधिक होते हैं गर्म और नम जलवायु के कारण। चैन्नै-मुम्बई में भी यह बहाना चल सकता है।
मगर बेंगलूरु, हैदराबाद, मनिपाल, चण्डीगढ़, दिल्ली, आगरा, कानपुर, इलाहाबाद, वाराणसी, गोरखपुर… हर जगह कीड़े काट रहे हैं और ये ज़्यादातर हाथ पर ही काटते हैं। काला-काला सा निशान पड़ जाता है हाथों पर इनके काटने के बाद। कभी-कभी किसी-किसी को कई बार काट लेते हैं - तो कई निशान पड़ जाते हैं। कभी-कभी कमर या कन्धे पर भी काट ले रहे हैं। 
सुई लेने के पहले बाँह कसना
अभी बरसात का मौसम नहीं, ऐसे में और अब से पहले के मौसम में कीड़ों का इतना काटना कुछ अजीब नहीं है?
सरकार को माहौल में सुधार लाने के लिए कुछ करना होगा। मगर आप भी कुछ कीजिए, देखिए कहीं आप के आस-पास तो किसी को कीड़े बार-बार नहीं काट रहे। आप किसी का जीवन बचा सकते हैं ऐसा करके।
ठीक ऐसे ही निशान पड़ते हैं उन हाथों पर भी जिन पर ड्रग्स/नशे का इंजेक्शन लिया जाता है, और बार-बार लिया जाता है। बहुत बार हाथों पर, कन्धे पर या अन्य शरीर पर जो टैटू बना होता है, उसमें इंजेक्शन लिए जाने पर निशान नज़र नहीं आता। इसलिए भी एकाएक टैटू चलन में आया है।
टैटू-बिच्छू
मुझे तो पता नहीं था अब तक, मगर ऐसी चौंकाने वाली बातें पता चलते ही मैंने इसी लिए साझा करना चाहा कि शायद किसी एक को भी ज़्यादा नुकसान से बचा सके कोई, तो यह प्रयास सफल हो जाएगा।
हाथ में नशे की सुई
दूसरे यह भी ध्यान देने की बात है कि अगर आप के सेवक, ड्राइवर या आस-पास के दुकानदार, वीडिओ-डीवीडी पार्लर वाले, या ऐसे ही अन्य किसी के हाथों पर कीड़े काटने का निशान अक्सर और लगातार ज़्यादा दिन तक दिखे तो उस पर नज़र रखने व सावधान रहने की ज़रूरत हो सकती है, अपनी सुरक्षा के लिए। नशे का आदी किसी भी अपराध में संलिप्त होने के लिए मजबूर हो सकता है, कई कारणों से।
पाँव में नशे की सुई
विश्व स्तर पर इस सम्बन्ध में अब तक उपलब्ध जानकारी के अनुसार भारत में नशाख़ोरी की प्रवृत्ति भी और एच आई वी संक्रमण भी ग़रीबों-झोंपड़पट्टियों में ज़्यादा है। मुझे लगता है कि यह आँकड़े संख्या-जनित होंगे, प्रतिशत-जनित नहीं।
ऐसे लोग, ज़्यादातर एड्स के ख़तरे की ज़द में भी होते हैं क्योंकि इंजेक्शन का प्रयोग लापरवाही से या अदला-बदली से भी हो सकता है।
ये कोई सनसनी फैलाने के लिए नहीं है। हो सकता है कीड़े वाकई काट रहे हों कहीं-किसी को, मगर सावधान रहने में हर्ज है क्या?

हेरोइन पाउडर और सुई


चित्र और कुछ महत्वपूर्ण जानकारी यहाँ मिल सकती है-
http://www.navajocountydrugproject.com/meth_info.php
http://illegaleconomy.com/drugs/global-spread-of-injecting-drug-use.php
www3.endingsuicide.com/?id=1509:15145
http://www.bbc.co.uk/suffolk/content/image_galleries/drug_awareness_2007_gallery.shtml?6

Monday, May 17, 2010

लिखने की ठेलुअई

लिखने के कई कारण होते हैं। डायरी लिखना उनमें से सिर्फ़ एक है। ठेलुअई दूसरा है। man-sitting-clip-art-silhouetteसोचना तीसरा। सोचने की ठेलुअई… अब सब हमीं गिनाएँ क्या?
जो लोग डायरी लिखते हैं, वो उसे गोपनीय रखते हैं। तभी ईमानदार रह सकते हैं, लेखन में। जीवन में सब कुछ पारदर्शी नहीं होता। न होना चाहिए। ऐसा सबके साथ है, फिर भी लोग चाहते हैं कि दूसरे सब सच और यथार्थ तो लिखें ही, कुछ छुपाएँ भी नहीं।
जो हम ख़ुद नहीं करना चाहते, मगर दूसरों से उसकी अपेक्षा करते हैं, वह है "आदर्श"। "आदर्श" चूँकि आदर्श है, अत: वह यथार्थ से परे होगा ही। बहकी हुई बौद्धिकता से उपजा अहंकार ही व्यक्ति को उस आदर्श स्थिति को प्राप्त करने को उकसाता है, जो सैद्धान्तिक रूप से जीवनकाल में कभी संभव नहीं।

मगर इसी “आदर्श” स्थिति को प्राप्त करने को सिद्धान्त गढ़ता-बटोरता है व्यक्ति। बीमारी बढ़ जाय तो अपने "नए सिद्धान्त" की होमियोपैथी या कपाल-भाति शुरू कर देता है।
ऐसे सिद्धान्त का फ़ायदा ही क्या - जिस पर आप चल रहे हों, और दूसरे न जानें? तो दूसरों को जताना - कि बड़ा "सिद्धान्तवादी" व्यक्ति है, यह इच्छा नैसर्गिक परिणति है इस अवपथित बुद्धि और अहंकार-जनित सिद्धान्त-उन्मुख जीवन की।
यह बात कि कुछ ऐसा जो सामान्य-जन को अलभ्य है, उसके लिए हम प्रयास-रत हैं। इसी के प्रचार में उत्कण्ठा होती है कि लोग जानें सिद्धान्तवादिता हमारी। (जैसे गाँव-जवार में चर्चित होना-कि "आईएएस के इम्तहान में बैठ रहा है फलाने का लड़का। फारम भर दिया है" - बहुधा इतने पर तो शादी तय हो जाती है।)
ऐसे प्रयास की भी उन्मुक्त प्रशंसा होती है, और प्रशंसा बड़ी कमज़ोरी है मनुष्य की। ठीक निन्दा की तरह।

प्रशंसा की इच्छा वास्तव में एक मनोवैज्ञानिक सम्बल (ठीक से पढ़े – कम्बल नहीं) की भीख है कि अनुमोदन करो हमारे कृत्यों का, आचरण का। बचपन की अधूरी इच्छाओं का प्रेत है यह प्रशंसा पाने की इच्छा-बैताल सरीखा। इच्छा तो शरीर छूटने पर भी नहीं छूटती। (टिप्पणी पाने की इच्छा भी टॉफ़ी पाने की इच्छा का ही बुढ़ाता बचपना है।)
निन्दा भी प्रशंसा का ही अवतार है। निन्दा एक अवसर है-प्रशंसा पाने का-जो दूसरे के पैरों के नीचे से खींच लिया हमने - भले ही सफल हों या नहीं - प्रयास तो किया।
बड़े-बड़े लोग अत्यन्त निष्काम भाव से निन्दा करते हैं। फल मिले चाहे न मिले, हमने अपना कर्म कर दिया। बड़ा संतोष मिलता होगा निन्दा में, अपना धर्म निभा कर। कुछ-कुछ वैसा ही जैसा दूसरे का घर या पूजास्थल जला कर मिलता है। बगल वाले की दुकान ज़्यादा चल रही है, कसमसा रहे हैं। मौका मिला-दंगा बरेली में हुआ, दुकान रायबरेली में फूँक दी उसकी। फूँकने के पहले अगर लूट नहीं भी पाए, तो तोड़फोड़ तो करनी ही है।
Danda Guru मास्टर साहब ने टिल्लन को मारा, होमवर्क न कर पाने पर। अगले दिन मास्टर साहब के घर के सामने, सड़क के दोनों तरफ़ दिवालों पर कोयले से टिल्लन को लिख देना है कुछ। अब कुछ अच्छा तो नहीं ही लिखेंगे टिल्लन।
अब जैसे हम लिख रहे हैं। लिख रहे हैं अपनी सनक, मगर किसी ने अगर पढ़ लिया तो बढ़िया। कुछ बोला तो और बढ़िया। टिप्पणी कर दी तो अति उत्तम। अगर तारीफ़ कर दी, तो क्या बात है! छा गए गुरु! मगर टिप्पणी के ऐसे निरर्थक गंभीरता से पगे उत्तर देंगे, जैसे हमने लिखा तो सिर्फ़ अपने लिए था, आपने पढ़ लिया तो पढ़वा कर हमने अहसान किया, और आपकी इस ताक-झाँक को माफ़ किया। अरे अगर अपने लिए ही लिखा था, तो ब्लॉग पर क्यों लाए?
लोग टिप्पणी अगर देंगे, तो वह भी अहसान के भाव से: कि "जाओ टिप्पणी दी-तुम भी क्या याद करोगे!…”

“ऐं…! क्या याद करोगे? अबे याद रखना-और हमारे उधर भी आना टिपियाने। जैसा भी हमने उधर लिखा है, तुमने कौन सा अच्छा लिखा है? अगर तुम्हारे ब्लॉग पर देखा जाय तो तुम्हारे लिखे से अच्छी तो टिप्पणी दी है हमने।"
इसी तरह के पारस्परिक अहसान से दुनिया चलती है, चाहे वह भौतिक हो या ऐन्द्रजालिक। हमारे रेलवे पर वर्क-रूपी (कामरूपी नहीं) अहसान से रेल का काम चल रहा है और रेल के हम पर तनख़्वाह-रूपी अहसान से हमारा घर। इसी अहसान के आदान-प्रदान से देश में यातायात और देश की प्रगति चल रही है।
Clipart Thinkerयानी इच्छा और अहसान के बिना न व्यक्तिगत जीवन जिया जा सकता है, न सामाजिक। यही आदर्श सिद्धान्त है।
(हम भी तो बूँक लें!)
अगर लम्बा लिखा जाय और आपकी टाइपिंग गति धीमी हो, या बीच में व्यवधान आते रहें-फ़ोन कॉल, पत्नी, आवश्यक कार्य या फिर सू-सू ही आ जाय, तो विचार-गति की दुर्गति हो जाती है क्योंकि मूड बदल जाता है। और मूड बदले तो अपनी बेवकूफ़ियाँ और तीव्रता से समझ में आने लगती हैं। इसीलिए एक ब्लॉगिये को अपनी पोस्ट जल्दी से ठेल कर किनारे हो लेना चाहिए, ताकि कहीं अपनी बेवक़ूफ़ी को पहचान कर - अवसाद से बचने के लिए वह डिलीट ही न कर दे अपनी लिखाई।
बचना ऐ ……… लो मई आ गया … अरे भाई! मई भी तो अब आधा चला गयाऽऽऽऽ