साथी

Showing posts with label 1411. Show all posts
Showing posts with label 1411. Show all posts

Wednesday, March 31, 2010

अपठनीयता और हम


डॉ0 जगदीश गुप्त कहा करते थे - "कवि वही जो अकथनीय कहे"
हमें कुछ गड़बड़ प्रेरणा मिल गई लगता है, सो हम समझे बिलागर वही जो अपठनीय लिखे।
बस इसीलिए गड़बड़ा रहे हैं, बड़बड़ा रहे हैं…
* * * * * * * * *
"यक्षत्व" लगता है "बुद्धत्व" की ओर पहला कदम है।
लगता है कि "यक्षत्व" में बड़ा तत्व है,
अधिक यक्षत्व प्राप्त ही "बोधिसत्व" है…
नहीं, ऐसा है कि जिसे प्रश्न मिले, उत्तर नहीं - उसमें तो "यक्षत्व"
जिसे उत्तर भी मिल गए - वही बना "बोधिसत्व"
* * * * * *
बात में है थोड़ा "गूढ़त्व"
बढ़ाता है "मूढ़त्व"
* * *
पहले जब "छाया" प्रति नहीं होती थी
(तब "छाया" मन को छूती थी, गिरजाकुमार माथुर परेशान थे बिचारे, मना करते रहते थे कि छूना नहीं - छूना नहीं - मन को। ये बात सोचने की है कि आज क्या वो अस्पृश्यता के अपराध में धरे जाते या नहीं? वैसे भी "छाया" तो फ़ीमेल हुई, सो दो-दो एक्ट लगते उनके खिलाफ़। अरे हम कहाँ बहक गए? वापस पोस्ट पर चलें)
हाँ तो जब छायाप्रति नहीं होती थी, तब भी प्रमाणित प्रतिलिपि होती थी महत्वपूर्ण दस्तावेजों की। उसे राजपत्रित अधिकारी के हस्ताक्षर और मुहर के तले प्रमाणित किया जाता था, ताकि मूल दस्तावेजों की प्रामाणिकता जाँचने तक इन्हें आधिकारिक माना जाए।
(अब आजकल जो सुविधा और संभावना का युग है उसमें आप मूल प्रमाणपत्र भी तीन-चार बनवा लें तो हम क्या करें? मगर तब ऐसा ही था।)
तो उसमें प्रमाणपत्र की जो हस्तलिखित या टंकित प्रति तैयार की जाती थी उसमें मूल हस्ताक्षर की नकल तो उतार नहीं सकते थे, (कहा न, ये तब की बात है, आजकल की नहीं! समझा करो यार) तो उसकी जगह लिखा जाता था "अपठनीय" या "अपठित"।
बोले तो "इल्लेजिबुल" अंगरेज़ी में। (इल्लेजिटिमेट नहीं, कहा न ये तब की बात है,…फिर वही…)
तो मतलब समझे आप?
यानी कि जो सबसे महत्वपूर्ण चीज़ थी उस दस्तावेज में, वही अपठनीय।
इस से यह भी आसानी से समझा जा सकता है कि जो जितना अपठनीय, उतना महत्वपूर्ण।
* * *
हो सकता है गुप्त जी ने "अकथनीयता" वाली बात की इंस्पिरेशन (अब बड़े लोग ये सटही प्रेरणा आदि थोड़े ही लेते होंगे) भी ऐसी ही अपठनीयता से ली हो!
सो हम भी कभी-कभार अपठनीय होते रहेंगे, ऐसा सोचा है।
फ़ुटनोट- सबसे ज़रूरी, सबसे काम की बात फ़ुटनोट में या हाशिए पर ही लिखी जाती है। काम ज़्यादा करने वाले आदमी भी हाशिए…छोड़िए, हम कह ये रहे थे कि छायाप्रति न हो पाने के दौर में काग़ज़ की बर्बादी कम होती थी और काग़ज़ खर्च भी कम जीएसएम का होता था, कई-कई प्रतियाँ जो टाइप करनी पड़ती थीं, कार्बनपेपर लगाकर।
तब प्रवीण पाण्डेय के 37 पेड़ बचे रहते थे और होली में पेड़ ज़्यादा जलाए जाते थे बनिस्बत टायरों के या काग़ज़ बनाने पर पेड़ों के खर्च से। यानी काग़ज़ की क़श्ती, काग़ज़ के फूल, काग़ज़ के शेरों के बदले केवट की क़श्ती, टेसू-गुलाब और शायरी के ही नहीं असली शेरों का ज़माना था।
फ़ुटनोट का फ़ुटनोट - पिछ्ले नवरात्रि के दौरान अधिकांश चित्र माता दुर्गा जी के जो दिखे, उनमें उनका वाहन बाघ चित्रित था, शेर नहीं। कल को 1411 बचे बाघ…माता वाहन न बदल लें कहीं।

Friday, March 26, 2010

बाघ के बहाने (1411 ही बचे हैं, बस!)

1411 बचे हुए बाघों की दुहाई देकर कहा जा रहा है कि बाघों के बारे में कुछ भी कर के, मेल भेज कर, ब्लॉग लिख कर, फ़ोटोशूट में हिस्सा लेकर…आप सहयोग दे सकते हैं बाघों को बचाने में।
बचाना किससे है, पता ही है - आदमी से। अब आदमी से कौन किसको बचा सकता है ?
आदमी से जंगल नहीं बचे। न बचे जंगली।
पहाड़ नहीं बचे आदमी से। खोद डाले।
आदमी से सागर नहीं बचे। मछलियाँ मर रही हैं, कछुए मर रहे हैं। अन्य जल-जीव भी।
आदमी से अन्तरिक्ष नहीं बचा। वहाँ भी कचरा तैर रहा है।
आदमी से आदमी तक को तो बचा नहीं पाते हम लोग। लड़कियों औरतों की बात तो ख़ैर जाने ही दीजिए।
*   *   *   *   *   *   *   *   *
मगर हालात अभी भी ऐसे नहीं कि लाचार हो कर बैठ जाया जाए।
असली दिक्कत इसी बात की है कि बाघ ख़ुद भी तो बचने को तैयार हों। लगता है ख़ुद ही बचना नहीं चाहते ये बाघ।
आदमी के साथ-साथ रहने का सबसे आसान उपाय बताया था – दुम हिलाना सीख लो। अब बाघ हैं कि दुम हिलाने को राज़ी ही नहीं। दुम हिलाते भी हैं तो बड़े आराम से, धीरे-धीरे और घात लगाते हुए। बाघ की दुम हिली, यानी झपटने को तैयार है बाघ।
सावधान! बाघ की दुम का हिलना कोई अच्छा शकुन नहीं आदमी के लिए।
*   *   *   *   *   *   *   *   *
मिट जाएँगे, पर दुम नहीं हिलाएँगे। यह भी ठीक है।
दुम हिलाने लगे तो बाघ थोड़ा ही रह जाएँगे वो! वही बन जाएँगे जो दुम हिलाने वाले कहलाते हैं।
और इसीलिए उन्हें दुम हिलाने की सलाह मंज़ूर नहीं।
पर यह दुम हिलाने की सलाह अगर उनकी समझ में आ जाती तो गिनती के ही क्यों बचते?
अब ऐसी भी क्या बाघियत? अब अगर यह बाघियत वाली बात हमारी समझ में आ जाती, तो हम ही कौन सा आदमी रह जाते? बाघ न बन जाते!
मगर तब कोई जनसंख्या-समस्या न होती आदमी को लेकर। गिनती के बचते 1411, या और कम। पर तब क्या बाघ या दूसरे जन्तु हमें बचा रहे होते?
*   *   *   *   *   *   *   *   *
कमज़ोर सबसे पहले धर्म-परिवर्तन, वफ़ादारी परिवर्तन, स्थान-परिवर्तन आदि करके अपने को जिलाए रखने की कोशिश में लगे रहे हैं। जो मज़बूत हैं उन्हीं के मिट जाने का ख़तरा नज़र आता है अक्सर। गधे और कुत्ते-बिल्ली को कोई ख़तरा नहीं है, ख़तरा बाघ-शेर वगैरह को है। बकरे-मुर्गे-बतख़ें-सूअर-भेड़ आदि नियमित व्यञ्जन-सूची का हिस्सा बनकर भी शान से अपनी जनसंख्या बरक़रार रखे हैं। पैदा होने से भी पहले - अण्डे को ही खा जाता है आदमी, मगर मिट जाने का कोई ख़तरा नहीं उन्हें।
बाघों को हमेशा ही ख़तरा रहा है।
अब तो आदमी भी उसे बचाने पर तुल गया है। 
नेता भी। मीडिया भी। कोशिश जारी है कि ब्लॉगिए भी आस्तीन चढ़ा कर जुट जाएँ। 
यानी इस बार कुछ ज़्यादा ही ख़तरा है बाघ को । मज़बूत जो हैं बाघ ।


"जब से वो बाग़बाँ हुए यारो!
सारे जंगल धुआँ हुए यारो!" 

बस तालिबान और अल-क़ायदा या इण्डियन मुजाहिदीन और जुट जाएँ बचाने में… 
*   *   *   *   *   *   *   *   *
वैसा ही एक ख़तरा हिन्दी को भी बताया जाता रहा है, कि अगर लचीलेपन को न अपनाया तो मिट जाने का ख़तरा है। तो अगर वाकई ख़तरा है तो ये ख़ुश होने की बात है कि हिन्दी भी मज़बूत है। और ये बात भी खुशी की है कि ब्लॉगरी का बड़ा अहम योगदान होगा इस मज़बूती को बनाए रखने और बढ़ाते जाने में।
हिन्दी को बहुत फलता-फूलता देखना है अभी हमारी ही पीढ़ी को, बल्कि हमसे पिछ्ली पीढ़ी भी देखेगी, मगर ये भी ज़रूरी है कि ख़ुशफ़हमियाँ और मुग़ालते पहचान कर उन्हें दूर करने की कोशिश करें हम हिन्दीभाषी, समय रहते।
हिन्दी का स्वर्ण-युग आने को है।                
और शायद हिन्दुस्तान – हिन्दुस्तानियों का भी।


हिमान्शु मोहन
इब्तिदा=आग़ाज़=शुरूआत=पहल