यह मातृ-दिवस पर कल लिखी गयी रचना है, इसीलिए आज ही आ सकी…
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माँ को जादू ज़रूर आता है!
कैसे हर बात जान जाती है
वो भूख-प्यास हो के दर्द हो के नींद लगे
पढ़ाई हो के छुप के शैतानी
किसने लड्डू निकाले डब्बे से
कौन पिल्ले उठा के लाया है
माँ को जादू ज़रूर आता है…
माँ की जब बात न मानो तो पीछे पछताओ
खेलो पानी से फिर हरारत हो
देख लें दादी तो क़यामत हो
जला के माचिसें खेलो तो हाथ जल जाए
काट ले बर्र तो बस जान ही निकल जाए
चोट पे फूँक का जादू सा असर
माँ को जादू ज़रूर आता है…
चीनी खालो तो पेट में गड़बड़
माँ नहीं करती दादी सी बड़-बड़
खाओ अमिया तो फुंसियाँ निकलें
कितनी गन्दी! कहाँ-कहाँ निकलें!
आँख में किरकिटी कि हाथ की फाँस-
माँ के छूते ही दर्द ग़ायब हो
माँ को जादू ज़रूर आता है…
माँ खिलाती है तो भर जाता है जी
बस चले तो पिला ही डाले घी
दूध पीना है सुबह एक गिलास
रात की बात रात को होगी
जब पहाड़े सुनेगी माँ हमसे
सेंकती जाएगी संग-संग रोटी
माँ के हाथों से दाल की ख़ुश्बू
माँ को जादू ज़रूर आता है…
और इक रोज़ बड़े होके सभी
माँ को समझाने लगें जाने क्या
माँ तो सब कुछ समझती है लेकिन
उनके समझाने की नासमझी पे
माँ को आता है तरस बच्चों पे
उनकी मजबूरी - दुनियादारी पे
माँ कहे या न कहे बात कोई-
माँ को जादू ज़रूर आता है.…
फिर भी माँ है के समझ जाती है
कोई हुज्जत नहीं, सवाल नहीं
किसी भी बात पर बवाल नहीं
और इक रोज़ वो भी आता है-
जब कोई दर्द बाँटने के लिए
सदा की तरह माँ नहीं रोती
क्योंकि उस रोज़ माँ नहीं होती
माँ को जादू ज़रूर आता है, माँ को जादू ज़रूर आता है……
यथासंभव यह ब्लॉग हिन्दी में, हिन्दी हेतु रहेगा। सर्च इंजनों या अन्य तकनीकी कारणों से कुछ कोटि-शब्द अंग्रेज़ी में भी हो सकते हैं। मूलत: यह एक इलाहाबादी ब्लॉग है उस संगम के तीर(तट) से, जिसमें पवित्र नदियों गंगा, यमुना और अदृश्य सरस्वती का मिलन होता है जो यहाँ की साहित्यिक-सांस्कृतिक अन्तर्धारा में प्रवाहित है।
साथी
Monday, May 10, 2010
Sunday, May 9, 2010
अभिव्यक्ति-1
अंग्रेज़ी का एक्सप्रेशन हिन्दी के अभिव्यक्ति का केवल भावानुवाद है, पूर्ण अनुवाद नहीं। अभिव्यक्ति में वह भी आ जाता है जो अंग्रेज़ी के इम्प्रेशन का अभिप्राय है।
यह प्रचलन के अनुसार आरोपित अर्थ है अभिव्यक्ति का।
अभिव्यक्ति का सीधा ताल्लुक सीधी बात से है। अभि से 'अभिधा' शब्दशक्ति और व्यक्ति से 'व्यक्त' की भाववाचक संज्ञा से तात्पर्य है। मज़े की बात यह है कि हम आराम से सभी प्रकार के एक्सप्रेशन को अभिव्यक्ति मानकर काम चला लेते हैं, भले ही वहाँ कोई बात कही जा रही हो या नहीं। जैसे हँसना, रोना, शब्दहीन गायन या वादन, चित्रकला इत्यादि। इससे यह भी पता चलता है कि हम कितने भावप्रवण और समझदार हैं जो अबोले को भी बूझते रहते हैं भाषाई खेल में।
भाषाओं को सीखने में यह भी एक मज़ेदार अनुभव होता है कि बहुधा जो शब्द प्रचलित अनुवाद में, यहाँ तक कि कोष में भी दिए होते हैं वे भी सम्यक् रूप से उस शब्द का पूरा और अविचल अनुवाद नहीं कर पा रहे होते। एक उदाहरण तो अभिव्यक्ति ही हो गया। अन्य भी कई शब्द हैं, जिनका सूक्ष्म भेद भाषाओं को समान अधिकार से जानने वाले ही समझ पाते हैं।
जैसे स्लैण्डर, ऐस्पर्शन, बैक-बाइटिंग, बिकरिंग आदि सब थोड़े-थोड़े अन्तर से निन्दात्मक अर्थ में प्रयुक्त होते हैं अंग्रेज़ी में। हिन्दी में कहें तो नमस्ते, नमस्कार, प्रणाम आदि सभी अभिवादन में प्रयुक्त होते हैं - मगर कभी सोचा है कि अभिवादन क्या है?
जो सामर्थ्य एक भाषा में है, वह ज़रूरी नहीं कि दूसरी में भी उस शब्द के अनुवाद में हो या अनुवाद हो ही। जैसे हिन्दी में पत्र लिखते समय, शिष्टाचारवश सभी संबन्धियों को उनकी पात्रता के अनुरूप प्रणाम, आशीष, स्नेह, प्यार आदि लिख भेजने का चलन था। 'था' इसलिए कि अब तो ख़ैर, पत्र लिखना ही 'था' हो चुका है। मगर एक वाक्यांश होता था- "घर में सबको यथायोग्य"। तो ये जो यथायोग्य था - ये था अभिवादन - सबको एक बार में, जिस की जैसी(यथा) पात्रता(योग्य), वैसा अभिवादन!
दूसरी भाषा में नहीं मिलता यह प्रयोग।
यह प्रचलन के अनुसार आरोपित अर्थ है अभिव्यक्ति का।
अभिव्यक्ति का सीधा ताल्लुक सीधी बात से है। अभि से 'अभिधा' शब्दशक्ति और व्यक्ति से 'व्यक्त' की भाववाचक संज्ञा से तात्पर्य है। मज़े की बात यह है कि हम आराम से सभी प्रकार के एक्सप्रेशन को अभिव्यक्ति मानकर काम चला लेते हैं, भले ही वहाँ कोई बात कही जा रही हो या नहीं। जैसे हँसना, रोना, शब्दहीन गायन या वादन, चित्रकला इत्यादि। इससे यह भी पता चलता है कि हम कितने भावप्रवण और समझदार हैं जो अबोले को भी बूझते रहते हैं भाषाई खेल में।
भाषाओं को सीखने में यह भी एक मज़ेदार अनुभव होता है कि बहुधा जो शब्द प्रचलित अनुवाद में, यहाँ तक कि कोष में भी दिए होते हैं वे भी सम्यक् रूप से उस शब्द का पूरा और अविचल अनुवाद नहीं कर पा रहे होते। एक उदाहरण तो अभिव्यक्ति ही हो गया। अन्य भी कई शब्द हैं, जिनका सूक्ष्म भेद भाषाओं को समान अधिकार से जानने वाले ही समझ पाते हैं।
जैसे स्लैण्डर, ऐस्पर्शन, बैक-बाइटिंग, बिकरिंग आदि सब थोड़े-थोड़े अन्तर से निन्दात्मक अर्थ में प्रयुक्त होते हैं अंग्रेज़ी में। हिन्दी में कहें तो नमस्ते, नमस्कार, प्रणाम आदि सभी अभिवादन में प्रयुक्त होते हैं - मगर कभी सोचा है कि अभिवादन क्या है?
जो सामर्थ्य एक भाषा में है, वह ज़रूरी नहीं कि दूसरी में भी उस शब्द के अनुवाद में हो या अनुवाद हो ही। जैसे हिन्दी में पत्र लिखते समय, शिष्टाचारवश सभी संबन्धियों को उनकी पात्रता के अनुरूप प्रणाम, आशीष, स्नेह, प्यार आदि लिख भेजने का चलन था। 'था' इसलिए कि अब तो ख़ैर, पत्र लिखना ही 'था' हो चुका है। मगर एक वाक्यांश होता था- "घर में सबको यथायोग्य"। तो ये जो यथायोग्य था - ये था अभिवादन - सबको एक बार में, जिस की जैसी(यथा) पात्रता(योग्य), वैसा अभिवादन!
दूसरी भाषा में नहीं मिलता यह प्रयोग।
Saturday, May 8, 2010
कंपनीबाग, इलाहाबाद
यही बाक़ी निशाँ होगा
चन्द्रशेखर आज़ाद की प्रतिमा, शहीद हुए जहाँ वो उसी स्थान पर लगभग। मेले हर बरस लगने की उम्मीद भी कुछ ज़्यादा ही लगा ली क्या रामप्रसाद बिस्मिल ने?
सालाना माल्यार्पण तो होता है यहाँ और उस दिन आइस्क्रीम और चुरमुरे के ठेले भी आ जाते हैं एक दो, मेला..
पता नहीं और जगहों पर यह भी होता है या नहीं!
अब सेलेबुलता के आधार पर मेले प्रायोजित किए जाते हैं।
जय हो!
अच्छी रचना वही जो रचने को उकसाए
मेरा अपना मानना है कि उत्तम कृति हमेशा कुछ और नया रचने की प्रेरणा देती है, बाद में याद आती है और हॉण्ट करती रहती है।
जितनी तीव्रता हो इन अनुभूतियों में, उतना ही उस चित्र, मूर्ति या रचना की गुणवत्ता ऊपर समझता हूँ मैं। यहाँ तक कि ईश्वर प्रदत्त रूप-शारीरिक सौष्ठव संबंधी सौन्दर्य हो या जीवन यात्रा में शनै:शनि: और क्रमश: विकसित व्यक्तित्व के गुण या सम्पूर्ण व्यक्तित्व, उसकी भी सार्थकता इसी में है कि वह सर्जना और कल्पना के नए आयामों को जन्म दे, नया कुछ रचने की उत्कण्ठा जगाए।
मैं अक्सर जब कोई रचना पढ़ कर आनन्दित होता हूँ तो तुरन्त वहीं उसी सोच और अन्दाज़ में कुछ रचने की कोशिश करता हूँ।
।
विचार करने पर बाद में मैंने पाया कि यह एक प्रतिक्रिया है मेरे अवचेतन की जो एक ओर तो यह जताती है कि मैंने भाव और सोच के उसी स्तर पर पहुँचने का प्रयास किया जिस पर रचना हुई, और दूसरे यह भी कि पढ़ी जा रही रचना इतनी अच्छी है कि प्रेरणा दे रही है, कुछ नया रचने जैसी।वास्तव में रचना को ठीक से समझ पाने की ही कोशिश है यह भी, उस रचना से सामञ्जस्य बिठाने की अवचेतन प्रक्रिया।
मगर दोस्त का कहना था कि यह स्पष्टीकरण साझा करना चाहिए मुझे। यह इसलिए साझा करना ज़रूरी है कि कभी किसी को यह खटक भी सकता है और नकल उतारने या चुनौती देने जैसा भी लग सकता है, जो उद्देश्य नहीं है, बिल्कुल नहीं है। अपनी इस आदत पर पहले कभी ध्यान नहीं गया मगर अब एक दोस्त के ध्यान दिलाने पर देखा तो बात मुझे तो कुछ अटपटी नहीं लगी। मैं अपनी ख़ुशी और पसन्द का इज़हार अगर ऐसे ही करता हूँ तो करता हूँ; इसमें अटपटा क्या है?
सो दोस्त के कहने से स्पष्टीकरण तो दे दिया, मगर अपनी इस आदत को नहीं बदलूँगा मैं। एक तो ये मेरा रचना से आनन्दित होने का अपना तरीक़ा है, और तिस पर यही मेरी सहज प्रतिक्रिया की प्रक्रिया है।
जितनी तीव्रता हो इन अनुभूतियों में, उतना ही उस चित्र, मूर्ति या रचना की गुणवत्ता ऊपर समझता हूँ मैं। यहाँ तक कि ईश्वर प्रदत्त रूप-शारीरिक सौष्ठव संबंधी सौन्दर्य हो या जीवन यात्रा में शनै:शनि: और क्रमश: विकसित व्यक्तित्व के गुण या सम्पूर्ण व्यक्तित्व, उसकी भी सार्थकता इसी में है कि वह सर्जना और कल्पना के नए आयामों को जन्म दे, नया कुछ रचने की उत्कण्ठा जगाए।
मैं अक्सर जब कोई रचना पढ़ कर आनन्दित होता हूँ तो तुरन्त वहीं उसी सोच और अन्दाज़ में कुछ रचने की कोशिश करता हूँ।
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विचार करने पर बाद में मैंने पाया कि यह एक प्रतिक्रिया है मेरे अवचेतन की जो एक ओर तो यह जताती है कि मैंने भाव और सोच के उसी स्तर पर पहुँचने का प्रयास किया जिस पर रचना हुई, और दूसरे यह भी कि पढ़ी जा रही रचना इतनी अच्छी है कि प्रेरणा दे रही है, कुछ नया रचने जैसी।वास्तव में रचना को ठीक से समझ पाने की ही कोशिश है यह भी, उस रचना से सामञ्जस्य बिठाने की अवचेतन प्रक्रिया।
मगर दोस्त का कहना था कि यह स्पष्टीकरण साझा करना चाहिए मुझे। यह इसलिए साझा करना ज़रूरी है कि कभी किसी को यह खटक भी सकता है और नकल उतारने या चुनौती देने जैसा भी लग सकता है, जो उद्देश्य नहीं है, बिल्कुल नहीं है। अपनी इस आदत पर पहले कभी ध्यान नहीं गया मगर अब एक दोस्त के ध्यान दिलाने पर देखा तो बात मुझे तो कुछ अटपटी नहीं लगी। मैं अपनी ख़ुशी और पसन्द का इज़हार अगर ऐसे ही करता हूँ तो करता हूँ; इसमें अटपटा क्या है?
सो दोस्त के कहने से स्पष्टीकरण तो दे दिया, मगर अपनी इस आदत को नहीं बदलूँगा मैं। एक तो ये मेरा रचना से आनन्दित होने का अपना तरीक़ा है, और तिस पर यही मेरी सहज प्रतिक्रिया की प्रक्रिया है।
Friday, May 7, 2010
क्या हम समाज का अंग नहीं हैं?
कई दिन से यहाँ कुछ पोस्ट नहीं किया - जो पोस्ट यहाँ के लिए लिख रहा था वह अब बाद में आएगी। आज ज्ञानदत्त जी की ताज़ा पोस्ट पढ़ी-आशा और प्रयास के प्रति आस्था को सुदृढ़ करती हुई। जिज्ञासा बनी थी उनकी पिछली पोस्ट के बाद से - कि यारो अब क्या होगा?
जो लोग प्रवीण पाण्डेय के शब्दों में छ्लक जाने को आतुर हों, उन्हें छलकने से रोकने को प्रयत्नशील।
पोस्ट पढ़कर, टिप्पणी देकर ही चुका था कि नज़र पड़ गयी इस पोस्ट के लिंक पर, सो फ़ोन का झुमका देखने चला गया। पढ़ कर सवाल पैदा हुआ मन में - सो आप सब से शेयर करने को ले आया - कि क्या हम लोग भी समाज का हिस्सा ही नहीं हैं? अगर समाज-सेवा के लिए, समाज की बेहतरी के लिए हम प्रयत्न करना अच्छा समझते हैं तो व्यक्तिगत उन्नति के लिए प्रयास जल्दी क्यों बन्द कर देते हैं?
क्या ज्ञानदत्त जी को अपनी समस्या, जो उन्होंने साझा सरकार को अविश्वास मत से बचा ले जाने वाले "जुगाड़" से निपटा ली थी, उसके बाद भी निकम्मेश्वरों को चेताने के लिए आगे ठेलनी चाहिए थी या नहीं?
यह मैं स्पष्ट कर दूँ कि यह विभाग मेरे ही अधीन है, जिसे इस सुविधा के प्रदान करने का प्रबन्ध और यत्न करना था, मगर मेरी प्रतिक्रिया इसलिए नहीं - बल्कि इसलिए है -कि मैं स्वयं भी निजी मामलों में सक्रियता का स्तर इसी तरह कमज़ोर और नीचा ही रख पाता हूँ। आज तक मैं इस बात से स्वयं अनभिज्ञ था कि ऐसी कोई समस्या कभी कहीं उठी।
यानी समाज के लिए तो सब कुछ, और अपने लिए प्रयत्न क्यों नहीं? हम भी तो इसी समाज का अंग हैं - या नहीं हैं? अगर अपने को भी समस्या से उबारा - तो समाज के ही एक हिस्से की समस्या दूर हुई न!
मैं भी ऐसा ही कुछ करता शायद, जैसा और जो उन्होंने किया, शायद मैं उससे बहुत अलग कुछ नहीं करता, मगर प्रश्न उठा तो ले आया - सार्वजनिक कर दिया कि झुमका है, तो उसको गिराना भी तो पड़ेगा न!
अब झुमके के लिए मैं यही शुभकामना देता हूँ, कि बरेली के बाज़ार में गिरे या न गिरे, यहीं गिरे या चाहे कहीं भी गिरे, मगर गिरे ज़रूर।
जो लोग प्रवीण पाण्डेय के शब्दों में छ्लक जाने को आतुर हों, उन्हें छलकने से रोकने को प्रयत्नशील।
पोस्ट पढ़कर, टिप्पणी देकर ही चुका था कि नज़र पड़ गयी इस पोस्ट के लिंक पर, सो फ़ोन का झुमका देखने चला गया। पढ़ कर सवाल पैदा हुआ मन में - सो आप सब से शेयर करने को ले आया - कि क्या हम लोग भी समाज का हिस्सा ही नहीं हैं? अगर समाज-सेवा के लिए, समाज की बेहतरी के लिए हम प्रयत्न करना अच्छा समझते हैं तो व्यक्तिगत उन्नति के लिए प्रयास जल्दी क्यों बन्द कर देते हैं?
क्या ज्ञानदत्त जी को अपनी समस्या, जो उन्होंने साझा सरकार को अविश्वास मत से बचा ले जाने वाले "जुगाड़" से निपटा ली थी, उसके बाद भी निकम्मेश्वरों को चेताने के लिए आगे ठेलनी चाहिए थी या नहीं?
यह मैं स्पष्ट कर दूँ कि यह विभाग मेरे ही अधीन है, जिसे इस सुविधा के प्रदान करने का प्रबन्ध और यत्न करना था, मगर मेरी प्रतिक्रिया इसलिए नहीं - बल्कि इसलिए है -कि मैं स्वयं भी निजी मामलों में सक्रियता का स्तर इसी तरह कमज़ोर और नीचा ही रख पाता हूँ। आज तक मैं इस बात से स्वयं अनभिज्ञ था कि ऐसी कोई समस्या कभी कहीं उठी।
यानी समाज के लिए तो सब कुछ, और अपने लिए प्रयत्न क्यों नहीं? हम भी तो इसी समाज का अंग हैं - या नहीं हैं? अगर अपने को भी समस्या से उबारा - तो समाज के ही एक हिस्से की समस्या दूर हुई न!
मैं भी ऐसा ही कुछ करता शायद, जैसा और जो उन्होंने किया, शायद मैं उससे बहुत अलग कुछ नहीं करता, मगर प्रश्न उठा तो ले आया - सार्वजनिक कर दिया कि झुमका है, तो उसको गिराना भी तो पड़ेगा न!
अब झुमके के लिए मैं यही शुभकामना देता हूँ, कि बरेली के बाज़ार में गिरे या न गिरे, यहीं गिरे या चाहे कहीं भी गिरे, मगर गिरे ज़रूर।
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